‘ बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा ‘ सत्संग और रामकथा की लंकिनी – डॉ. वर्षा सिंह,सागर

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

सत्संग और रामकथा की लंकिनी

– डॉ. वर्षा सिंह

पिछले दिनों यह समाचार पढ़ा था कि गांजा तस्करी में लिप्त एक व्यक्ति मनुज (परिवर्तित नाम) को पुलिस ने पकड़ा है। नारकोटिक्स विभाग द्वारा मनुज से की गई पूछताछ में यह बात सामने आई कि मनुज एमबीए का छात्र रह चुका है और उसके पिता पुरोहताई का कार्य करने वाले सम्मानित कथावाचक ब्राह्मण हैं, जबकि मां किसी शिक्षण संस्थान में अध्यापिका हैं। ग़लत व्यक्तियों की संगत में पड़ कर मनुज मादकद्रव्यों की तस्करी करने लगा। बार-बार पूछे जाने पर भी उसने अपनी गैंग के मुखिया और इस काम में उसके अन्य सहयोगियों के बारे में मुंह नहीं खोला। मनुज की निष्ठा अपनी गैंग और उसके सरगना के प्रति गहरी थी।
जीवन में अच्छे और बुरे साथ का अपना अलग महत्व है। अच्छे व्यक्ति के प्रति निष्ठा से अच्छा और बुरे व्यक्ति के प्रति निष्ठा से बुरा परिणाम मिलता है। इसके अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। बुरे व्यक्तियों का साथ नारकीय यातनाएं देता है जबकि सत्संग का क्षण मात्र भी स्वर्ग के सुख के समान होता है।
एक पुरानी लोक कथा है राजा और उसके तीन जुड़वां बेटों की। एक समय की बात है कहीं किसी राज्य में एक राजा रहता था। एक दिन जब वह आईने के सामने खड़ा था तो उसे कनपटी के बाल सफेद नज़र आए। वह सोचने लगा कि मैं अब बूढ़ा हो रहा हूं तो मुझे चाहिए कि मैं अपने बेटों में से किसी एक को राज्य का उत्तराधिकारी बना दूं। किन्तु किसे बनाऊं। राज्य में लागू नियम-क़ायदे के अनुसार आयु में बड़ा राजकुमार ही राज्य का उत्तराधिकारी होता था। किन्तु अब तो तीनों राजकुमार जुड़़वां हैं। बिलकुल एक सी उम्र के हैं, मात्र कुछ क्षणों के जन्मांतर से बड़े-छोटे का भेद उचित नहीं, तीनों शक्तिशाली हैं और अभी तक समान रूप से उनका पालन-पोषण किया गया है। तब राजा ने सोचा इनमें से जो ज़्यादा बुद्धिमान होगा, उसे ही उत्तराधिकारी घोषित करूंगा।
सोच- विचार कर एक दिन राजा ने तीनों राजकुमारों को बुलाया और तीनों को एक-एक स्वर्ण मुद्रा देते हुए उन्हें तीन खाली कमरे दिखाए और उनसे कहा कि इस एक स्वर्ण मुद्रा से तुम सभी अलग-अलग कोई ऐसी वस्तु लेकर आओ, जिससे तुम्हारा कमरा पूरा भर जाए। पहले तो राजकुमारों ने कहा कि एक स्वर्ण मुद्रा में ऐसी कोई वस्तु नहीं आ सकती है, जिससे कमरा भर सके। लेकिन जब राजा ने कहा कि तुम्हें एक स्वर्ण मुद्रा से ही कमरा भरने का सामान लाना है तो वे मज़बूर हो कर एक स्वर्ण मुद्रा से पूरा कमरा भरने लायक सामान लेने चल दिए।
तीनों राजकुमारों की संगत अलग-अलग थी। दो राजकुमारों के दोस्त नकारा क़िस्म के, लापरवाह और बुरी आदतों वाले थे। इसीलिए जब उन दो राजकुमारों ने अपने मित्रों को समस्या बताई तो उन्होंने राजकुमारों को समस्या का हल तत्काल में सुझा दिया। मित्रों के सुझाव पर अमल करके एक राजकुमार ने अपनी मुद्रा से कचरा खरीदा और कमरे में भर दिया। दूसरे ने घास खरीदा और उसे कमरे में भर दिया। तीसरा राजकुमार संतों की संगत में रहता था, वह बुद्धिमान था। उसने किसी से कुछ नहीं पूछा, बल्कि स्वतः निर्णय ले कर वह अपनी एक स्वर्ण मुद्रा से एक दीपक खरीद कर ले आया और कमरे में दीपक रख कर उसे जला दिया। दीपक की रोशनी पूरे कमरे में फैल गई और पूरा कमरा रोशन हो गया।
राजा समझ गया कि उसके तीन जुड़़वां बेटों में से कौन अधिक बुद्धिमान है तो उसने तीसरे राजकुमार को अपने राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।
इस प्रकार सही संगत में रहने वाले राजकुमार को सुपरिणाम प्राप्त हो गया।

रामचरित मानस के बालकाण्ड में तुलसीदास ने धूल के माध्यम से संगत का परिणाम बड़े सुंदर और सरल ढंग से बताया है। वे कहते हैं –

गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा।
कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥
साधु असाधु सदन सुक सारीं।
सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं॥

अर्थात् धूल का जब हवा के सम्पर्क होता है तो वह आसमान में शिखर पर चढ़ जाती है और जब वही धूल पानी के साथ सम्पर्क में आती है तो कीचड़ में मिल जाती है। वैसे ही साधु के घर के तोता-मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं।

रामकथा में लंकिनी भी इसका एक उदाहरण है। वह अहंकारी और दुराचारी लंकापति रावण की अनुचरी थी। इसीलिए अपने अधिपति की एक निष्ठावान सेविका होने के बावज़ूद उसका नाम कभी आदरपूर्वक नहीं लिया गया। लंकिनी राक्षस कुल में जन्मी प्रतिभावान स्त्री थी जिसके बल-बुद्धि से प्रभावित हो कर रावण ने अपने लंका नगर की सुरक्षा हेतु नियुक्त किया था। लंकिनी के पास अनेक मायावी तथा आसुरी शक्तियां भी थीं । जिसके बल पर वह लंका की रक्षा करती थी। वह अपनी विशिष्ट शक्तियों से समुद्र, आकाश और पाताल में भी विचरण कर सकती थी । जिसके कारण उसका वध करना लगभग सामान्य मनुष्य के लिए असंभव था। इसी असीमित शक्तियों के कारण ही रावण ने लंकिनी को लंका की सुरक्षा के लिए रखा था ।
कुछ पौराणिक ग्रंथों में यह कथा भी मिलती है कि एक बार रावण ने ऋषि-मुनियों के रक्त से भरा घड़ा मिथिला के राजा जनक की नगरी में गाड़ दिया था और जब रावण को यह ज्ञात हुआ कि यह रक्त कलश ही उसके विनाश का कारण बन सकता है, तब रावण ने लंकिनी को उस रक्तघट को नष्ट करने के लिए मिथिला नगरी भेजा। जब इस बात का पता पवनपुत्र मारुति को लगा कि लंकिनी उस रक्तघट को नष्ट करने जा रही है, तब वे वहां पर पहुंच गए और उसी घड़े को सुरक्षित किया, जिससे सीता का जन्म होने वाला था। राम तथा सीता का विवाह तथा रामायण की रचना होने वाली थी। पवनपुत्र मारुति ने वहां पहुंचकर लंकिनी को रोका तथा उसको वहां से भगा दिया। कालांतर में मिथिला में पानी नहीं बरसने के कारण अकाल पड़ने पर ऋषियों के सुझाव पर मिथिलानरेश राजा जनक ने हल चलाया। हल की नोंक लगने से भूमि में दबा हुआ घड़ा टूट गया और सीता का अवतरण हुआ।
प्राचीन ग्रंथों में यह कथा भी मिलती है कि जब ब्रह्मा के वरदान से रावण को सोने की भव्य नगरी लंका प्राप्त हुई तो रावण अत्यंत प्रसन्न हो उठा। प्रसन्नतावश उसे यह ध्यान ही नहीं रहा कि सोने की इस नगरी की सुरक्षा के लिए किसी शक्तिशाली पहरेदार की आवश्यकता होगी। तब ब्रह्मा ने राक्षस कुल में जन्मी शक्ति की पर्याय लंकिनी को लंका का मुख्य प्रहरी बनाया कर उसे लंका की सुरक्षा का भार सौंप दिया। लंकिनी ने ब्रह्मा से पूछा कि वह कब तक अनेक अवगुणों से युक्त लंकापति रावण की स्वर्ण नगरी लंका की सुरक्षा करती रहेगी। इस पर ब्रह्मा ने कहा कि जब एक दिन वानर रूप में रुद्रावतार हनुमान यहां आयेंगे तब उनके एक ही प्रहार से तुम परास्त हो जाओगी। उस समय लंका की सुरक्षा का तुम्हारा दायित्व पूर्ण हो जायेगा व तुम्हें प्रहरी बने रहने से मुक्ति मिल जाएगी।
कालांतर में हुआ भी यही। जब हनुमान समुंद्र लांघकर सीता की खोज में लंका नगरी पहुंचे तो लंकिनी से उनका सामना हुआ और अंतोगत्वा लंकिनी हनुमान की मुष्टिका के एक प्रहार मात्र से पराजित हो कर भूमि पर गिर पड़ी।
रामचरितमानस के सुंदरकांड में इस प्रसंग को दोहा, चौपाई के माध्यम से महाकवि तुलसीदास ने इस तरह वर्णित किया गया है –

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार॥

अर्थात् नगर के बहुसंख्यक रखवालों को देखकर हनुमान ने मन में विचार किया कि अत्यंत छोटा रूप धरूँ और रात के समय नगर में प्रवेश करूँ।

मसक समान रूप कपि धरी।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥

अर्थात् हनुमान मच्छर के समान छोटा सा रूप धारण कर नर रूप से लीला करने वाले राम का स्मरण करके लंका को चले। लंका के द्वार पर लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। वह बोली- मेरा निरादर करके बिना मुझसे पूछे कहाँ चला जा रहा है?

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥

अर्थात् हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना जहाँ तक जितने चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर ल़ुढक पड़ी।

पुनि संभारि उठी सो लंका।
जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा।
चलत बिरंच कहा मोहि चीन्हा॥

अर्थात् वह लंकिनी फिर अपने को संभालकर उठी और डर के मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। वह बोली- रावण को जब ब्रह्मा ने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसों के विनाश की यह पहचान बता दी थी ।

बिकल होसि तैं कपि कें मारे।
तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता।
देखेउँ नयन राम कर दूता।।

अर्थात् जब तू बंदर के मारने से व्याकुल हो जाए, तब तू राक्षसों का संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं राम के दूत आपको नेत्रों से देख पाई।

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥

अर्थात् हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर दूसरे पलड़े पर रखे हुए उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो क्षण मात्र के सत्संग से होता है।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

अर्थात् कौशलपुर यानी अयोध्या के राजा रघुनाथ को हृदय में रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। जो राम को हृदय में रखता है उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है।

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।
राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥

अर्थात् और हे गरुड़ ! सुमेरु पर्वत उसके लिए रज के समान हो जाता है, जिसे राम ने एक बार कृपा करके देख लिया। तब हनुमान ने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और भगवान् का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया।

संगत के बारे में संत कबीर के कुछ दोहे कण्ठस्थ करने योग्य हैं, यथा –

कबीर संगत साधु की, नित प्रति कीजै जाय।
दुरमति दूर बहावासी, देशी सुमति बताय।।

अर्थात् कबीर कहते हैं कि प्रतिदिन जाकर संतों की संगत करो। इससे तुम्हारी दुबुद्धि दूर हो जायेगी और सन्त सुबुद्धि बतला देंगे।

कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खांड़ भोजन मिलै, साकत संग न जाय।।

अर्थात् कबीर कहते हैं, संतों की संगत में जौ की भूसी खाना अच्छा है। खीर और मिष्ठान आदि का भोजन मिले, तो भी बुरे की संगत में नहीं जाना चहिये।

कबीर संगति साधु की, निष्फल कभी न होय।
ऐसी चंदन वासना, नीम न कहसी कोय।।

अर्थात् संतों की संगत कभी निष्फल नहीं होती। मलयगिर की सुगंधि उड़कर लगने से नीम भी चन्दन हो जाता है, फिर उसे कभी कोई नीम नहीं कहता।

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
कबीर संगत साधु की, कटै कोटि अपराध।।

अर्थात् एक पल आधा पल या आधे का भी आधा पल ही संतों की संगत करने से मन के करोड़ों दोष मिट जाते हैं।

कवि रहीम ने भी कहा है –
रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग।
करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग।।

कविवर रहीम कहते हैं कि जिनकी प्रवृत्ति उजली और पवित्र है अगर उनकी संगत नीच से न हो तो अच्छा ही है। नीच और दुष्ट लोगों की संगत से कोई न कोई कलंक लगता ही है।

मादकद्रव्यों की तस्करी में लिप्त व्यक्तियों की संगत में यदि मनुज नहीं पड़ता तो अपराधी बन कर उसे कलंकित नहीं होना पड़ता। समाज में उसका भी मानसम्मान बना रहता। लंकिनी यदि रावण जैसे खलचरित्र के नगर की प्रहरी न हो कर राम की शरण में जीवनयापन करती होती तो रामकथा में उसे यथोचित सम्मान मिलता। बुराई का अंत होता है और ऐसे में जो बुरे लोगों की सेवा- संगत करते हैं उनको उसका दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरे कुछ दोहे –

भला कभी होता नहीं, बुरे व्यक्ति का सेतु ।
सूरज को राहू ग्रसे, ग्रसे चंद्र को केतु ।।

राम-चरण रज से हुए, हनूमान भगवान ।
रावण की संगत मिटा, लंकिनी का सम्मान ।।

धरती को जब भी मिले, “वर्षा” का सत्संग ।
पर्वत, घाटी पर चढ़े, हरियाली का रंग ।।

सागर, मध्यप्रदेश

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