लघुकथा : जिंदगी बदल गई – मधूलिका सक्सेना ,भोपाल

लघुकथा

जिंदगी बदल गई

“बेटी कैसी हो ?”
“अच्छी हूँ पिताजी”
” देखो बिटिया माता पिता से झूठ नहीं बोलना चाहिए”
“सच पिताजी आप फिकर न करें मैं बिल्कुल ठीक हूँ”
“बेटी तुम जानती नहीं हो माता पिता के पास एक तीसरी आँख होती है”
” आप व्यर्थ ही चिंतित हैं पिताजी”
” पर मैं अपनी तीसरी. आँख से देख रहा हूँ तुम खुश नहीं हो बेटी”
” आपको भला ऐसा क्यों लग रहा है पिताजी!!”
“मेरी देख रहा हूँक्षकि तुम कुछ छुपा रही हो।”
“हाँ पिताजी इधर कुछ दिनों से मन उदास रहता है ”
” बेटी चिंता चिता के समान होती है मुझे बताओ उदासी का क्या कारण है?”
” आप क्या करेंगे जानकर?”
” मैं कुछ उपाय करूंगा, बेटी तुम इधर लगातार दुबली भी हो रही हो”
“हां पिताजी गंदगी से स्वास्थ्य तो गिरना ही है उपर से पेड़ पौधे भी कंक्रीट के जंगल में गुम होते जा रहे हैं”
“ओह मतलब तुम्हें साँस लेने में भी तकलीफ हो रही है बेटी!!”
” हाँ पिताजी पेड़ पौधौं की कमी ने केवल हवा ही दूषित नहीं की उपजाऊ मिट्टी की भी कमी हो गई है”
“ओह मतलब खाना भी सही नहीं मिल रहा है”
” जी पिताजी खाना खराब और कम मिल रहा है”
“ओहो बेटी ये सब क्या हो रहा है”
“पिताजी पौधे न होने से सारा जलचक्र और मौसम चक्र ही नष्ट हो रहा है”
“तुमने तो मुझे चिंता में डाल दिया बेटी!”
“हाँ पिताजी पेड़ नहीं तो वाष्पीकरण नहीं, वाष्पीकरण नहीं तो बादल और वर्षा नहीं, और ये दोनों नहीं तो पेड़ नहीं, जीवन नहीं….”
“अरे राम! इसीलिए गर्मी बढ़ रही है , मैं भी मर सा रहा हूँ”
” हाँ पिताजी पिछले 33 वर्षों में आपकी ऊँचाई 8,848 फीट में से 1.3 मीटर कम हो गई है”
कह कर वेगवती नदी गंगा दुखी होकर पिता हिमालय से लिपट गई और बन गई, उसकी आँखों के किनारे ठहरा मानों बस एक आँसू!!

मधूलिका सक्सेना
भोपाल

1 COMMENT

  1. प्रदूषण की पीड़ा बयान करती नदी की मार्मिक व्यथा लघुकथा के माध्यम से…बहुत-बहुत बधाई मधुलिका जी

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