लघुकथा : देश में विदेश – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

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देश में विदेश

‘पापा आपको पता है आज प्रिंसिपल मैडम हमारी क्लास के बच्चों को पिकनिक पर ले जा रही हैं ‘ अनुराधा बड़े लाड़ से पापा के गले में गलबहियाँ डालते हुए बोली ।
‘अच्छा…कौनसा स्पॉट चुना है भई उन्होंने बच्चों को घुमाने के लिए ‘
‘पता नही…बस इतना ही कहा है सबसे, कि सब बच्चों को अपने अलावा एक दो लोगों का लंच एक्स्ट्रा लाना है….।’
‘पिछली बार वह हमें दिव्यांग बच्चों के स्कूल ले गई थी।तब भी मम्मी से कहकर अधिक खाना ले गई थी मैं…. बड़े प्यार से खाया था उन्होंने सब बच्चों द्वारा लाया खाना…हम सबने उनके साथ दिन भर खेलते हुए बहुत इंजॉय किया था तब….।उन्होंने भी जी भर कर मस्ती की थी हम लोगों के साथ..’
‘हो सकता इस साल फिर किसी ऐसी ही जगह ले जाने का इरादा हो मैडम का…..।’ पापा न कहा
‘ठीक है अनु…चली जाना बना तो दिया है तुम्हारे मन मुताबिक लंच ‘ मम्मी जी ने सातवीं कक्षा में पढ़ रही अनुराधा को तैयार करते हुए कहा…।
‘पर मम्मी मुझे एक बात समझ नही आई उन्होंने इस बार सबसे अपने-अपने घर से पुरानी साड़ियाँ और मर्दाना कपड़े जो घर के बड़े लोग नही पहनते हैं, क्यों मंगवाए होंगे … ‘
अनुराधा के मम्मी पापा की नजरें यकायक एक दूसरे की ओर उठी और आँखोँ-आँखों में ही दोनों ने परस्पर जवाब तलब कर लिया ।
‘निकाल दूंगी पुराने कपड़े…तुम्हारे दादा-दादी के…ट्रंक में रखे हैं बहुत सारे …ले जाना…’
दादा दादी के नाम से ही अनुराधा को दो ढाई साल पहले का वो दिन याद हो आया जब पापा दादा दादी को एयरपोर्ट छोड़ने जा रहे थे ।पापा ने बताया था दादा दादी कनाडा ताऊ जी के पास जा रहे हैं फ्लाइट से।उस दिन वह दोनों के पैरों से लिपट कर बहुत रोयी भी थी।उन्होंने भी गोद में उठा कर बहुत सारी पप्पियों से उसके गाल गीले कर दिए थे।सोचते-सोचते उसके हाथ अपने आप अपने गालों को सहलाने लगे।महसूस हुआ आँखों से कोई झरना सा फूट कर गालों पर आ गया है।
चलो अनुराधा रखो सामान और टिफिन गाड़ी में।टाइम से स्कूल पहुँचना है न तुम्हे….।हम दोनों को भी ऑफिस जाना है तुम्हे छोड़ कर….।
स्टेट म्यूजियम की सैर के बाद जैसे ही स्कूल बस *ओल्ड एज होम* के सामने रुकी और मैडम ने सबको बस से उतरने के।लिये आवाज लगाई ‘चलो सब उतरिये…आज हम सब यहाँ रह रहे बुजुर्गों के साथ लंच करेंगे ।शाम तक हम सब उनके साथ ही समय बिताएंगे ।जिसकी जिस गेम में रुचि है वह अपनी जोड़ी बना कर खेल सकता है।सभी अपने बैग और टिफिन हमें दे कर थोड़ी देर को खेल लो…’।
सभी बच्चे बड़े उत्साह से बस से उतर कर प्रांगण में दाखिल हो गए ।सब बच्चों को अपने दादा-दादी और नाना-नानी की उम्र के बुजुर्ग अपनी ओर प्यार भरी नजरों से देखते हुए दिखाई दिए।
अनुराधा ने भी टिफिन और कपड़े का बैग मैडम को दिया और दौड़ पड़ी सहेलियों की ओर…।
लुका-छिपी खेल के बीच में ही अनायास उसकी आँखों को किन्हीं खुरदुरे हाथों ने मींच लिया..।उसने दोनों हाथों से खुद को छुड़ाने की कोशिश की… पर बेकार गई…। ‘आप कौन है… मेरी आँखों से हाथ हटाइये जल्दी…बहुत दुख रहा है…छोड़िए न मुझे…’ वह थोड़ी देर में ही छटपटाने लगी थी…
‘मुझे पहचाना नही अनु बिटिया….’ और इतना कहते ही उन्होंने अनु को अपनी पकड़ से मुक्त कर दिया । पर दूसरे ही पल वह किसी और की बाहों में कैद थी। ‘ देखो भागवान आज इतने सालों बाद हम अपनी पोती से मिल रहे हैं…।’ अनुराधा ने ध्यान से दोनों चेहरों का परीक्षण किया और उन्हें पहचानते ही वह दंग रह गई।
खुशी और आश्चर्य मिश्रित भाव उसके चेहरे पर अठखेलियाँ करने लगे…वह लगभग चिल्लाते हुए दादा दादी से लिपट ही गई।
उसकी बाल बुद्धि को भी उनके यहॉं होने का आशय समझते उसे देर न लगी,और वह दौड़ कर मैडम जी के पास चली गई…दादा-दादी भी उसके पीछे दौड़े…
‘ मैडम जी से फोन लेकर उसने पापा को डायल किया ‘पापा अनु बोल रही हूँ *कनाडा* से…आपने बताया नही पापा… *कनाडा* हमारे शहर के बीचों बीच है…अब मैं यही रहूंगी अपने दादा-दादी के पास…मुझे अब लेने मत आइयेगा…’
और इतना कहते ही वह फ़्फ़कते हुए फिर से दादा-दादी की बाहों में सिमट गई….।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

5 COMMENTS

  1. कुकरेजा जी बहुत ही मार्मिक वर्तमान समय का सत्य उद्घाटित करती रचना।विषय को बहुत खूबसूरती से शब्दों में बाँधा। आपको और “युगप्रवर्तक” (देवेंद्र जी) को बधाई

    • सादर आभार मधुलिका जी उत्साहवर्धन के लिए

  2. बार-बार पठनीय और खूब विचारणीय ,तथा सामाजिक सरोकार से जुड़ी हृदय को छूती एक उत्कृष्ट रचना।
    👏👏👏🌹🌹🌹💐💐💐🌹🌹🌹👏👏👏

    • भाई एजाज अंसारी जी आप निरन्तर प्रोत्साहित करते हैं।उत्कृष्ट टिपण्णी से नवाजते हैं।सच में आगे के लेखन के लिए आत्म विश्वास में बढ़ोतरी होती है।आपका सादर आभार

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