काव्य भाषा : घर हो सबका चंदन – डॉ. साधना अग्रवाल , ग्वालियर

घर हो सबका चंदन

सात फेरे, गठबंधन, कश्म – वादों का मंजन,
दो दिलों का संगम, घर हो गया मेरा चंदन,
घर हो गया मेरा चंदन….

बिन बोले ही समझूं, दर्द तेरा मैं हर लूं,
दिल के हर कोने में, अपना नाम मैं लिख दूं,
अपना नाम मैं लिख दूं…
प्यार है मेरा संबल, सुनो अब इसका गुंजन,
हुआ जो पहला क्रंदन, घर हो गया मेरा चंदन,
घर हो गया मेरा चंदन…

कोई सौगात न तोलूं, कोई रिश्ता न भूलूं,
तेरे नयनों में बसकर, सारे जहां को देखूं,
सारे जहां को देखूं…
आ जाओ मेरे अंजन, हो त्रासों का भंजन,
साधना करती वंदन, घर हो सबका चंदन,
घर हो सबका चंदन…

डॉ. साधना अग्रवाल
ग्वालियर (म.प्र.)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here