व्यंग्यम मधुरम : आत्मनिर्भर – डॉ राजीव पाण्डेय,गाजियाबाद

व्यंग्यम मधुरम : आत्मनिर्भर

शर्मा जी को रोकने का प्रयास किया आत्मनिर्भर लाल जी ने, लेकिन असफल।
वे अपनी धुन में सवार पैडल मारे चले जा रहे थे,पहुँच से काफी दूर पर थे लेकिन हार मानने वाले कहाँ थे श्री आत्म निर्भर लाल जी क्योंकि उन्हें अपने देश और मित्रों से काफी प्रेम जो था।
किसी तरह भागकर रोका शर्मा जी को और हाँफते हुए कहा कि ये क्या हाल बना रखा है, आज तक कभी गाड़ी से नीचे पैर नहीं रखा आज साइकिल पर सवार कैसे ?
यद्यपि शर्मा जी ने भी कई युगों के बाद साइकिल पकड़ी थी तो उनका भी काफी तेल निकल चुका था।इतना ही बोले ,”भाई हमारा परिवार आजादी से पहले ही देशभक्त रहा है और आज भी उसी परम्परा को निभाने का मैं भी प्रयास कर रहा हूँ।”
आत्मनिर्भर लाल का दिमाग चकराया ये कैसा उत्तर है सो रहा नहीं गया पूछ ही बैठे,” ये घुमा के उत्तर कब से देने लगे मेरा प्रश्न तो सीधा था लेकिन उत्तर कुछ गले नहीं उतरा।”
“दरअसल कोरोना काल में हम लोगों का दिमागी सन्तुलन ही नहीं गया गले भी अवरूद्ध हो गए है। तो गले के नीचे कैसे उतरेंगी हमारी बातें।” ये कहा शर्मा जी ने।
अब हाँफना कम हो चुका था। फिर आगे बढ़ने का प्रयास करने लगे।
जब प्रश्न सीधा समझ में न आये तो प्रश्न घुमाकर भी उत्तर पाने की अभिलाषा होती है। शायद यही सोचकर आगे बात को बढ़ाया।
“वो सब ठीक है लेकिन ये बताओ आगे कंडी में इस बोतल में क्या है?”
अरे भाई इतना भी नहीं समझते हो!
“इस बोतल में पेट्रोल है अभी- अभी जाकर पेट्रोल पम्प से लाया हूँ।”
क्या मतलब?
“मतलब सीधा है यार सुबह-सुबह देश को कुछ योगदान देने के लिये’ ये सब उपक्रम है।”
आत्म निर्भर लाल जी फिर चकराये आज शर्मा जी को क्या हो गया है जो एक भी उत्तर सीधा नहीं दे रहे हैं लगता है कि बुढापा सिर चढ़कर बोल रहा है इसीलिये सब उल जुलूल बक रहे हैं।
गुस्सा भी बहुत आ रहा था लेकिन उत्सुकता भी बढ़ रही थी आखिर शर्मा जी की बात का रहस्य क्या है।
इस बार काफी सोचकर लेकिन सकुचाते हुए बोले-“भाई मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा कुछ। सुबह साइकिल की सवारी, बोतल में पेट्रोल ये माजरा क्या है? कुछ बताओगे भी या यूं ही पहेलियां बुझाते रहोगे।”
पहले तो मनमोहन मुद्रा में खामोश रहे फिर पप्पू स्टायल में बाँहे चढाते हुए फेंकूलाल की तरह बोले भाइयों बहिनों अरे आप तो अकेले हो केवल भाइयो
देखो जब युद्ध हुआ तब हमने उपवास किया था या नहीं।
आत्म निर्भर लाल जी का ‘हाँ’ में सिर हिला।
जय जवान जय किसान भी हमने देखा या नहीं?
फिर सिर हिला।
बाद में जय विज्ञान भी देखा।
फिर सिर हिला।
काफी दिनों से हम अच्छे दिन देख रहें हैं या नहीं।आज देश चारों तरक्की कर रहा है या नहीं।
आत्मनिर्भर लाल जी कुछ बोलते उससे पहले ही शर्मा मनमोहन मुद्रा त्याग कर फेंकूँ लाल जी फेंके जा रहे थे। पहले मेरी सुनो
जो भी वित्तमंत्री रहता है उसकी उम्र के मुकाबले डॉलर की रुपया से ज्यादा है या नहीं।
सबके खाते खुले और जन धन जन धन का कभी इतना विकास देखा कि नहीं ,नहीं ना। पूरे विश्व में सम्मान बढ़ा कि नहीं। सबका साथ सबका विकास हुआ कि नहीं, सबका विस्वास मिला कि नहीं। हमने घर में घुसकर मारा कि नहीं। कितना गिनोगे उंगलियों पर निशान कम पड़ जायेंगे।
थोड़ी देर दोनों मौन रहे फिर शर्मा जी को कुछ याद आया बोलने लगे आज तुम्हें नींद नहीं आएगी तो बता रहा हूँ सुनो
ये बोतल में पेट्रोल इसलिए लाया हूँ कि जब हमारे उपयोग में आये और अपने मिलने वालों को दिखा सकूँ कि मैंने महंगाई के जमाने मे भी मैंने पेट्रोल खरीदी है। पीढियां हमारा एहसान मानें।
साइकिल इसलिए चला रहे हैं कि आज भी आव्हान किया गया है कि आत्मनिर्भर बनना है। तुम तो केवल नाम के आत्मनिर्भर लाल हो फिर भी नहीं समझते।
इस बार यह बात उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाली थी । शर्मा जी मैं आपका काफी रिगार्ड करता हूँ।इसका मतलब यह नहीं कुछ भी कहोगे ।

हम भी देश भक्त है चढ़ती कीमतों की तरह रोज हमारी उम्र भी बढ़ जाती है। फिर अपने नाम के अनरूप कार्य कर रहा हूँ। आप अभी भी आश्रित हैं लेकिन मैं तो बिल्कुल आत्मनिर्भर हो गया हूँ और देश के साथ हूँ।
वो कैसे? चकित होकर शर्मा जी ने पूछा ।
आपने तो साइकिल ले ली मैंने तो वो भी त्याग दी इसीलिए पैदल चलता हूँ। हूँ ना आत्म निर्भर।
शर्मा जी उन्हें सिर नवाया इतना ही बोल पाये आपसे भी हमें अब सीखना ही पड़ेगा अपने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिये।

डॉ राजीव पाण्डेय
कवि, कथाकार, व्यंग्यकार
वेवसिटी गाजियाबाद

मोबाइल 9990650570

9 COMMENTS

  1. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति सर जी ।
    आप की जितनी प्रशंशा की जाय उतनी ही है।
    अरुण अग्रवाल जिला अध्यक्ष
    ग़ज़िआबाद
    उज्ज्वल भारत मिशन।

  2. डॉ राजीव पाण्डेय जी का कहानी पढ़ा बहुत ही उम्दा हार्दिक बधाई

  3. बहुत ही सुन्दर व्यंग्यात्मक कहानी

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