विविध : आत्मनिर्भरता का झांसा और सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण -सतीष भारतीय सागर

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आत्मनिर्भरता का झांसा और सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण

जिस तरह हमारे मुल्क में मौजूदा सरकार सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर रही है वह आवाम के लिए एक ध्यातव्य मुद्दा बन गया है एक तरफ सरकार आत्मनिर्भरता की बात कर रही है तो वहीं दूसरी ओर सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर रही है भारत में भले ही 1991 में नई आर्थिक नीति के साथ निजीकरण का आगाज हुआ लेकिन असल में निजीकरण क्या होता है और कैसे होता है? यह मौजूदा सरकार बखूबी ढंग से आवाम को निजीकरण करके बता रही है। किंतु जिस तरह से सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण हो रहा है उसे देख कर लग रहा है कि यह निजीकरण देश की आवाम को निजी हाथों में सौंपने और गुलाम बनाने का जरिया है।

आज के दौर में जिस तरह निजी कंपनियां देश की पढ़ी-लिखी और अशिक्षित आवाम से कार्य करवाती है वह गौर करने योग्य है क्योंकि अधिकांश निजी कंपनियों में कार्य करवाने के स्वयं के दिशा निर्देश मुकर्रर होते हैं तथा उन कंपनियों में
संवैधानिक प्रावधान महज नाम के लिए रहते हैं उनका कोई विशेष रूप से पालन नहीं होता है दूसरी ओर
निजीकरण से निजी कंपनियों में भतीजावाद बढ़ने की अलामत है प्राइवेटाइजेशन से भारत आत्मनिर्भर बने या ना बने मगर मध्यम एवं निम्न वर्ग की दशा पर उसका का निकृष्ट प्रभाव जरूर पड़ेगा वहीं नौकरशाही में भी निजीकरण की वजह से पक्षपात होगा।

जुलाई 2020 में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक अधिसूचना में आगाह किया था कि 23 सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण का निर्णय लिया गया है
मगर विगत वर्ष 2020 में ही आरटीआई (सूचना के अधिकार) से ज्ञात हुआ था कि 23 नहीं बल्कि 26 कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने की मोदी सरकार तत्परता में है जिनमें प्रोजेक्ट एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड, इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स इंडिया लिमिटेड, पवन हंस लिमिटेड, कंपनी लिमिटेड, एयर इंडिया, सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, सीमेंट कॉर्पोरेशन इंडिया लिमिटेड (नयागांव इकाई), भारतीय चिकित्सा एवं औषधि निगम लिमिटेड, सलेम स्टील प्लांट, भद्रावती स्टील प्लांट, दुर्गापुर स्टील प्लांट, फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड, एनडीएमसी का नागरनार स्टील प्लांट, भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड, एचएलएल लाइफकेयर, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, कॉन्टेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड ,हिंदुस्तान प्रीफैब लिमिटेड (एचपीएल) ,भारत पंप्स एंड कम्प्रेशर लिमिटेड, हिंदुस्तान न्यूजप्रिंट लिमिटेड, कर्नाटक एंटीबायोटिक्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (केएपीएल), बेंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड, हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड (एचएएल), भारतीय पर्यटन विकास निगम, हिंदुस्तान फ्लोरोकार्बन लिमिटेड जैसी कंपनियां भी शामिल हैं। इस दौर में खासकर जिस प्रकार भारतीय रेलवे का निजीकरण हुआ है वह आम लोगों के लिए मुसीबतों का सबब है।

हाल ही में इस बार के बजट में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार बैंकों का निजीकरण करेगी और सरकार आने वाले समय में बैंक ऑफ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक तथा सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के निजीकरण की भी तत्परता में है।

वर्तमान सरकार के निजीकरण की नीति को देखकर मस्तिष्क में यह प्रश्न प्रजनित होते है कि क्या सरकार सार्वजनिक उपक्रमों की जिम्मेदारी से दूर होना चाहती है?
क्या निजीकरण से अर्थव्यवस्था सशक्त होगी? क्या आत्मनिर्भर भारत बनाने का एक मात्र जरिया निजीकरण है?
या फिर निजीकरण मध्यम एवं निम्न वर्ग को निजी कंपनियों का मुलाज़िम बनाने का जरिया है?

सतीष भारतीय
सागर

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