काव्य सन्ध्या “ढाई आखर” का आयोजन

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काव्य सन्ध्या “ढाई आखर” का आयोजन

साहित्य एवम समाज को समर्पित संस्था “परम्परा” गुरुग्राम द्वारा साहित्य का भविष्य तैयार करने हेतु, काव्य तथा संगीत गोष्ठियों का अनवरत क्रम ज़ारी है। इसी क्रम में “परम्परा” संस्था द्वारा “शारदे माँ के अवतरण दिवस तथा वसन्त पञ्चमी” के पावन अवसर पर एक काव्य सन्ध्या “ढाई आखर” का आयोजन मंगलवार, दिनांक 16 फरवरी’2021 को किया गया। इसमें कवियों द्वारा अपने-अपने घरों से ही मोबाइल व कम्प्यूटर के माध्यम से प्रेमरस तथा वासंती रंगों से भरपूर गीत व कविताएं पढ़कर, समारोह सफलतापूर्वक आयोजित किया गया।
गोष्ठी की अध्यक्षता प्रतिष्ठित सहित्यकार तथा सुरुचि संस्था के अध्यक्ष श्री मदन साहनी जी ने की। वरिष्ठ साहित्यकार एवम हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व अध्यक्ष डॉ मुक्ता जी मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान रहीं। गोष्ठी में विशिष्ट अतिथियों के रूप में श्री हरीन्द्र यादव, श्रीमती शकुंतला मित्तल, श्रीमती शारदा मित्तल, श्री रवि शर्मा, श्रीमती सुशीला यादव, डॉ बीना राघव, श्रीमती मीना “सलोनी”, सुश्री शेफाली सुरभि एवम श्रीमती परिणीता सिन्हा आदि साहित्यकार उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन तथा इन्दु “राज” निगम द्वारा प्रस्तुत माँ सरस्वती की वन्दना से हुआ। इस समारोह का आयोजन व संचालन परम्परा की संयोजिका श्रीमती इन्दु “राज” निगम तथा संस्थापक राजेन्द्र निगम “राज” द्वारा किया गया। तकनीकी सहायता प्रेरणा एवम अनिमेष द्वारा प्रदान की गई। सभी साहित्यकारों ने “परम्परा” संस्था को दिन दूनी-रात चौगुनी उन्नति करने हेतु अपनी शुभकामनाएं दीं। डॉ मुक्ता जी ने कहा कि आज के दिन लोग अनेकों प्रकार के दूसरे कार्यक्रमों में व्यस्त हैं, जबकि “परम्परा” ने भारतीय परम्परा को ध्यान में रखते हुए इस विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया। अन्त में श्री साहनी जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि महामारी के इस दौर में “परम्परा” संस्था द्वारा इस तरह ऑनलाइन कार्यक्रमों का आयोजन करके, कविता की अलख जगाना व हिन्दी हेतु समर्पण वास्तव में बड़ा ही सराहनीय कार्य है।

समारोह में प्रस्तुत रचनाओं की एक बानगी इस प्रकार है-

मेौसम वसन्त के आते ही नस नस में रस भर जाता है
गालों पर खिलते हैं गुलाब इधर मधु भर जाता है
-श्री मदन साहनी
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मैंने प्रश्न किया खुशी से
क्यों दूर-दूर रहती हो मुझसे
कहां रहती हो…ज़रा बतलाओ तो
-डॉ मुक्ता
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साथ-साथ है कौन तुम्हारे, लगते बड़े डिवाइन हो ?
कौन तुम्हारी सवप्न सुंदरी किसके वैलन्टाइन हो ??
-श्री हरीन्द्र यादव
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मेरा ढाई आखर प्यार शब्दों का मोहताज नहीं
सब कुछ समर्पित कर के भी रखता कुछ भी पाने की चाह नहीं
-श्रीमती शकुंतला मित्तल
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साजन की मनुहार पर ,मैं जाऊॅं बलिहार ।
मैं उनको दुनिया दिखूं, वो मेरा संसार ।।
-श्रीमती शारदा मित्तल
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हिन्दू मुसलिम देश में रहते , कुछ सिख और सिंधी हैं।
एक तार से पिरोये सबको वो तार तो हिन्दी है।।
-श्री रवि शर्मा
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झूम रही है डाली डाली कली कली मुस्काई है!
रंग बिरंगी छटा लिए बसंत ऋतु फिर आई है!!
-श्रीमती सुशीला यादव
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ओ प्यारे वसन्त न्यारे वसन्त,
तुम यूँ ही जग को महकाना
-डॉ बीना राघव
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तन मन हर्षित अकुलाया, देखो ॠतुराज वसन्त आया,
मंजुल धरा ओढ़ी धानी चुनर, कोयल मद कुहू कुहू बौराया।
-श्रीमती मीना “सलोनी”
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समाज की इन कुरितियों में तुम्हें कैसे उलझाऊँ
निर्भया के आँसू तुम्हें कैसे दिखलाऊँ
-श्रीमती परिणीता सिन्हा
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हे मां शारदे वसंत हो तुम्हारे सभी प्रणियों के जीवन में
हे मां शारदे वीणावादिनी सरस्वती
उन तक पहुंचे जीवन जिन्हें
दुख ने ही किया है अब तक आलिंगन।।
-शेफाली सुरभि
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फूलों को मुस्काने दो, कलियों को खिल जाने दो
इस वासंती मौसम को, गीत ख़ुशी के गाने दो
-श्रीमती इन्दु “राज” निगम
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कलियों वाली खशबू हो तुम,फूलों वाली डाली तुम
इस घर की तुम मर्यादा हो, इस घर की घरवाली तुम
-श्री राजेन्द्र निगम “राज”
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