विविध : ऋतुराज वसंत – डॉ चंचला दवे सागर म प्र

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ऋतुराज वसंत

सूर्य देव 12 राशियों में संक्रमण करते हैं ,तो प्रकृति नटी अपने परिधान श्रृंगार को बदल बदल कर उसका स्वागत करती है ,उस ऋतुराज बसंत की रंगशाला में जब महाकाल के नूपुर बज उठते हैं तब पुष्प पादप फूले नहीं समाते हैं। और हमारे लोचनों को सार्थक कर जाते हैं।
१४फरवरी को पाश्चात्य संस्कृति की तर्ज़ पर वेलेंटाइन डे और १६ फरवरी को वसंतोत्सव ,वसंत पंचमी हमारी आस्था से जुड़ा पर्व,शिव आराधना, वाग्देवी पूजन,मदनोत्सव, भारतीयता का वेलेंटाइन,या कहे पुष्प धूलि में मचलता वसंत या वसंत में मचलती पुष्प धूलि।
कहा जाता है वसंत पंचमी के पूर्व आम्र मंजरी को देखना शुभ होता है। चांदनी में एकटक निहारने से नेत्र ज्योति बढ़ती है ,सूंघने से नाक के रोग हवा हो जाते हैं।
वसंत तो मोहक स्निग्ध,मादक और ललित होता है। वसंत पंचमी के दिन महाकवि निराला,ब्रम्ह पुत्री सरस्वती का जन्म हुआ।
महाकवि पद्माकर तों वसंत का हर कोना झांक आये है। कोई ही बिरला कवि होगा जो वसंत के वर्णन से अछूता हो।
इस बरस वेलेंटाइन और बसंत दोनों पास पास है, वेलेंटाइन में वसंतोत्सव हावी रहेगा।
प्रकृति भी संदेश दे रही __लाली मेरे लाल की जित देखूं उत लाल।
हम जीवन के हर कोने को वसंत सा रखें,निश्छल, निस्वार्थ प्रेम अपनी परंपराओं के अनुशीलन में , अपने समाज और देश से करें।

डॉ चंचला दवे
सागर म प्र

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