लघुकथा : संकल्प -चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

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संकल्प

सुबह की पहली किरण को उसने श्रद्धापूर्वक नमन किया,माँ के पैर छुए,घर के मंदिर में दो अगरबती लगाईऔर हमेशा की तरह निकल पड़ा अपनी मंजिल तलाशने।
दिन भर तपती धूप में भटकने के बावजूद उसे जब कामयाबी हासिल नही हुई,तो लौट पड़ा वह निराशाओं की गर्त में डूबा हमेशा की तरह बगल में डिग्रियों की फाइल दबाए घर की ओर…।पिता की झिड़कियाँ सुनने की तो आदत सी हो गई थी उसे।पिता की खीझ स्वभाविक थी।बेटा किसी अच्छे ओहदे पर पहुँचे तो बहू लाने का सपना पूरा हो…।
वह स्वयं भी खुद को कोसने के सिवा कर भी क्या सकता था।प्रयास तो कर ही रहा था किसी अच्छी सी कंपनी में जॉब के लिये।
आज घर लौटते हुए वह बहुत खिन्न था।मन की उधेड़बुन खत्म होने का नाम ही नही ले रही थी…।और कितनी मशक्कत करनी पड़ेगी अपना कैरियर बनाने में…।आखिर कब पूरे कर पायेगा वह माँ पापा के सपनों को पूरा।दोनों ने ही भाई बहन को पढ़ाने में अपना जी जान लगा दिया था।माँ गृहस्थी के दायित्व निभाते हुए सिलाई बुनाई करती और पिताजी दिन भर फेरी लगा कर रोजगार करते।बड़ी बहन बिदा हो गई थी समय पर अपने घर…यह सुकून वाली बात थी।पर वह अब तक बोझ बना हुआ था माँ पापा पर….।कभी-कभी सोचता इतनी ऊँची पढ़ाई भी किस काम की जो आदमी अपना स्टेट्स बनाने के फेर में कोई छोटा-मोटा काम करने में भी शर्म महसूस करने लगे।
अपनी धुन में बढ़ते-बढ़ते अचनाक उसे ब्रेक लगाने पड़े।सामने रेड सिग्नल हो गया था।रुकते ही उसका ध्यान आसमान में ढलते सूरज की ओर चला गया । उसे लगा सूरज एकटक उसकी ओर ही देख रहा है ।आज उसे डूबते हुए सूरज की लालिमा बेहद आकर्षक लग रही थी।उसे लगा जैसे सूरज मुस्कुराते हुए उससे कह रहा है कि, *ऐ नई पीढ़ी के युवा जवान निराश मत हो…मेरी तरफ देख…आसमान में इतना ऊँचा उठने के बाद भी सुकून की तलाश में मुझे हर शाम नीचे आना ही पड़ता है अपने आपको अगले दिन के लिए तरोताजा करने के लिए…।उसे लगा जैसे वह कह रहा हो कि बेटा बहुत तपना झुलसना पड़ता है अपनी पहचान बनाने के लिए।और एक बार पहचान बन गई तो लोग ऊगते-ढलते सूरज को प्रणाम करने लगते हैं।तू भी कोशिश जारी रख.. शाम को घर में डूब…मगर दूसरे दिन फिर निकल नई ऊर्जा के साथ काम की तलाश में…*
अचनाक ही उसके पीछे खड़ी गाड़ियों के हॉर्न एक सुर में बजने से उसकी तन्द्रा भंग हुई और वह निराशा का गुबार पीछे छोड़ता हुआ फुल स्पीड में घर की ओर फर्राटे भरने लगा …दूसरे दिन तैयार बर तैयार होकर नई उम्मीद और आत्मविश्वास के साथ काम की तलाश में घर की दहलीज लाँघने के लिए….।आज उसे उत्साहित करने वाला सच्चा हमसफ़र जो मिल गया था सूरज के रूप में….।आखिर उसे भी तो एक दिन सूर्य सा चमकना है,अपने हिस्से के आसमान पर…।आज उसने दृढ़ संकल्प कर लिया था कि,अब वह ढलेगा भी तो फख्र के साथ और ऊगेगा भी सीना तान कर…अपनी नई पहचान के साथ…।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

1 COMMENT

  1. बहुत खूब।
    आज के युवा वर्ग की कुंठाओं से भरी जिंदगी में नवीन आशाओं का संचार करती है एक बेहतरीन लघुकथा।
    👏👏👏

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