काव्य भाषा : कैसे भूले हम हिन्दुस्तानी – सपना, “नम्रता” दिल्ली

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कैसे भूले हम हिन्दुस्तानी

कैसे भूले हम हिन्दुस्तानी
पुलवामा हमले का वह गहरा ज़ख्म
जिसने न जाने कितनों के
घर का कुल दीपक बुझा दिया
यह सारा देश छला गया….

न जाने कितनी ही माँओ की
सूनी कर दी गोद
अपने बेटों को सीने से लगाने
न जाने कितनों ने राह
देखा होगा उनका रोज़…

उस बुढ़े पिता पर भी
क्या बिता होगा
जिसने बेटे को लेकर बुने होंगे
कई सपने
सोचा होगा देश सेवा से होकर मुक्त
एक समय बाद
वह घर को लौट आएगा
अपने पिता की
बुढ़ापे की लाठी बन जाएगा…

उस पत्नी की पीड़ा को
कैसे करें शब्दों में बयान
न जाने कितनी ही रातें
करवट बदल बदल कर
काटी होगी
हर दम मन में यही डर
समाया होगा
सुहाग उसका क्या बोर्डर पर
सुरक्षित होगा
न जाने दिन -रात कितने बार
अपने पति की लम्बी आयु
के लिए प्रार्थनाएँ
उस खुदा से की होगी….

उस बेटी ने भी
सारी उम्र बिन पिता के
अपना जीवन जिया होगा
उसके कोमल मन के भी
कुछ सपने रहें होंगे
वह भी औरों की तरह
दिन भर की हर बात
अपने पिता को बताये….

हाय, मन की मन में रह जाए
कैसे भूले हम हिंदुस्तानी
देश पीड़ा की वह अमर कहानी।

सपना, “नम्रता”
दिल्ली।

3 COMMENTS

  1. खामोश रहें हम, तो लोग जवाब देते हैं।
    पर खामोश रहते भी हम, कयामत ला देते हैं।।
    पुलवामा को भुल जाए हम, ऐसा कभी न होगा।
    बदला तो हम एक इंच जमीन का भी लेते हैं।।
    कैसे भुल गए वो, कि हिंदुस्तानी हैं हम।
    बगैर जान का परवाह किए, दुश्मनों को धूल चटा देते हैं।।

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