काव्य भाषा : मैनपाट की सैर – सीमांचल त्रिपाठी सूरजपुर

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मैनपाट की सैर

चल रे मन चल,
मैनपाट की ओर।
वहां तो फैला है,
हरियाली चहुंओर।।

गुजरे थे जहां सिय,
राम संग लखन।
सुरम्य वादियों में,
हुआ अल्प रहन।।

टाईगर प्वांइट में,
ना मिले कोई टाईगर।
फिश प्वांइट में हम,
जा बैठते डांग धर।।

परपटिया की बात,
अनोखी,जहां है खाईं।
जलजली ज़मीं निराली,
जो मन मे हिलोर लाई।।

बलखाती नदियां यहां,
सरगम संगीत सुनाती है।
भव्य वादियों को देख,
मानो मन खो जाती है।।

यहां की सुबह सुहानी,
मचे सुरमई शाम का शोर।
कहें छत्तीसगढ़ में शिमला,
देशभर बाजे डंका जोर।।

हवा चलती सन सन कर,
रातों में है करती सांय सांय।
नाचता मन मयूर बनकर,
इन्द्रजाल आॅखों में छाय।।

तिब्बती लोग हैं यहां बसते,
हिन्द-बौद्ध का मेल मिलाय।
उल्टा पानी है धाम अज़ूबा,
मन को विस्मृत कर जाय।।

रोपाखार जलाशय पर लगे,
संस्कृति का अनुपम मेला।
मैनपाट की संस्कृति अनूठी,
झलक पाने लगा है रेला।।

सीमांचल त्रिपाठी
सूरजपुर

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