काव्य भाषा : बदलता वक्त – कुन्ना चौधरी ,जयपुर

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बदलता वक्त

जानें क्यों नहीं भूलती वो गलियाँ ,
भोले बचपन की चुहलबाजियाँ,
टहनी से जुड़े हरे पत्तों की कहानी,
अपनापन लिये वो शैतानियाँ……

पढ़ाई के बहाने खेल में वक्त गुज़ारना ,
पड़ोसन चाची से गृह कार्य पूरा करवाना,
मित्रों संग सड़क पर धमा -चौकड़ी मचाना ,
शिकायत कर के भाई से माफ़ी मंगवाना…

बेटी ने ससुराल के लिये था घर छोड़ा ,
बेटे ने तरक्की के लिये मुँह था मोड़ा ,
काल ने लील लिया बुजुर्गों का साया ,
दिल ने गलियों के वादों को पर न तोड़ा ……

अब भी यदाकदा वहाँ फेरे लगा आते हैं
पर जाने-पहचाने लोग कहाँ नज़र आते हैं ,
बदल गये बाज़ार नुक्कड़ के रंग ढंग,
घरों की जगह अब मॉल दिखाई देते हैं ……

वक्त के साथ-साथ सब जाता है बदल ,
सरल नहीं जीवन की समस्याओं का हल ,
रौनकें फिर वही देखना चाहता है मन ,पर
चाहने से कभी वापस नहीं आता बीता कल …..

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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