विविध : मीडिया का राष्ट्र, समाज ,साहित्य निर्माण में दायित्व व योगदान -एस के कपूर “श्री हंस” बरेली

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया का राष्ट्र, समाज ,साहित्य निर्माण में दायित्व व योगदान

जैसे जैसे विज्ञानं ने उन्नति की है, कंप्यूटर,इंटरनेट क्रांति सी आ गई है,और इस के साथ ही सोशल मीडिया,प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, हमारे जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गया है।कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और जब मीडिया समाज में रच बस गया है, तो साहित्य भी कागजों और पुस्तकों से निकल कर सोशल मीडिया व अन्य मीडिया में एक बाढ़ की तरह छा गया है।साहित्यकार ई -साहित्य में विश्वास अधिक मात्रा में करने लगे हैं क्योंकि केवल न्यूनतम समय में हज़ारों लाखों लोगों के बीच पहुँचाया जा सकता है ,परंतु जैसे कि प्रत्येक तस्वीर के दो पहलू होते हैं ,उसी प्रकार सोशल मीडिया व अन्य मीडिया के भी दो रुप होते हैं।एक अच्छा और एक बुरा।हम क्रमानुसार दोनों पक्षों की जाँच करेंगें।लाभ और हानि का विश्लेषण करेंगें। निःसंदेह गद्य साहित्य और पद्य साहित्य दोनों के लिखने,शुद्धिकरण करवाने,त्वरित गति से अधिक से अधिक मात्रा में लोगों के बीच पहुँचाने और पढवाने में इंटरनेट,सोशल मीडिया की भूमिका अहम हो गई है और साहित्य कारों द्वारा दुत्र और अच्छी बुरी प्रतिक्रिया मिल जाती है।जैसा कि हम जानते हैं, साहित्यिक कृतियों के भी दो प्रमुख अंग होते हैं।एक तो भाव,सन्देश और दूसरा शिल्प।अच्छे सन्देश, भाव तेजी से फ़ैलाने में, सोशल मीडिया अच्छा काम कर रहे हैं और उसके सार्थक परिणंम भी मिल रहे हैं।परंतु सिक्के के दूसरे पहलू की भांति ,सोशल मीडिया साहित्य की हानियाँ ,भी अनगिनत हैं।सबसे बड़ा अवगुण यह है ,कि किसी बिवादित मुद्दे पर तुरंत भड़काऊ भाषण रचना बन जाती है और जंगल की आग की तरह फैल जाती हैं और उसके दुष्परिणाम तुरंत सामने आ जाते हैं।इसके अलावा कट -पेस्ट बनाकर किसी की रचना की कॉपी करना आम बात हो गई है।ये साहित्य चोरी ,अच्छे लोगों में कुंठा और नवोदित साहित्यकारों में अनुशासनः हीनता भर देती है और सीखने की बजाय चोरी में नाम और मान ढूंढने लगें हैं।एक बहुत बड़ा अवगुण और भी है ,कि अति हर चीज़ की बुरी होती है।साहित्य की इस बाढ़ में अच्छी रचनायें बुरी रचनायों के नीचे दब जाती हैं।चूंकि हम को कंप्यूटर ,मोबाइल के कैपेसिटी के हिसाब से साहित्य को स्टोर और डिलीट करना पड़ता है तो हम उन पर बहुत ज्यादा समय दे ही नहीं पाते हैं और उनसे सीख ही
नहीं पाते हैं और केवल एक नज़र डाल कर रह जाते हैं।वह भाव संदेश ,लोगों के दिल में उतर ही नहीं पाता है और उसके वांछित लाभ भी प्राप्त नहीं हो पाते हैं।
समय की मांग है एक उचित संतुलन बना कर, सोशल मीडिया पर साहित्य सृजन हो, जिससे जन -जन को अपेक्षित परिणाम मिल सकें।इसके अलावा मीडिया का एक बहुत बड़ा दायित्व है कि न्यूज़ का सही पहलू दिखाना व किसी न्यूज़ बढ़ा चढ़ा कर और किसी न्यूज़ को काटकर किसी विशेष पार्टी को लाभ नहीं दिलाना।इसके अलावा मीडिया का आज एक दायित्व बनता है कि किसी न्यूज़ से वातावरण खराब हो सकता है तो उसे उस समय नही दिखाना।इसके अलावा एक जिम्मेदारी यह है कि देश,समाज की वास्तविक स्थिति देश विदेश में दिखाई जाये जिससे छवि पर यूँ ही प्रतिकूल असर नहीं पड़े। युवायों के लिए, बच्चों के लिए, महिलाओं के लिए, बुज़ुर्गों के लिए, अच्छी बात, उपयोग में लाने वाली बात, सब कुछ दिखाया जाना चाहिए न कि केवल टी आर पी को ध्यान में रख कर ही चीज़ें दिखाना।राजनीतिक दलों के बेकार के वाद विवाद की जगह उनके अच्छे कामों की चर्चा ज्यादा हो तो स्तिथि बेहतर होगी।यदि मीडिया जितनी जल्दी ठीक करेगा उतनी जल्दी देश,समाज, साहित्य, विकास,लोगों का विश्वास, मनोबल आदि की दिशा मैं सही ढंग से परिवर्तन होगा व मीडिया की भूमिका लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में ठीक अनुरूपित होगी।

एस के कपूर “श्री हंस”
बरेली

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