काव्य भाषा : वो गलियाँ – कुन्ना चौधरी,जयपुर

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वो गलियाँ

जहाँ महका करती थी वो कलियाँ,
छूट गई देखो आज वो बगिया….
नन्हे कदम आँगन में नाचते थे,
सूनी हो गई बाबुल की वो गलियाँ……

दो बहनों की जोड़ी थी निराली ,
कोमल रिश्ता जैसे फूलों की डाली !
एक की विदाई देख सारा कुनबा रोया ,
घर के संग दिल भी हो गया ख़ाली ……

बाबा का मन अब भी है तरसता ,
माँ का कलेजा रह रह है धड़कता ।
छोटी बहना हँसना गाना भूल गई ,
अंगना भी लौटने की राह है तकता ……

परदेसी पर कब लौटा है करते ,
अपनों के यहाँ मेहमान बन आते !
डाली से टूट कर फूल दोबारा कैसे जुड़े,
गलियों की यादों में ही खोये है रहते …..

नया घर नये लोग नये रिश्ते है बनते ,
उन गलियाँ के रिश्ते पर नहीं भूलते !
याद आते है सुख दुःख के लम्हे ,
नई जमीं पर उम्मीद के पुष्प है खिलते…..

कुन्ना चौधरी,
जयपुर

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