विविध : भुला दिया चौरी-चौरा के शहीदों का योगदान… -गरिमा संजय,दिल्ली

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भुला दिया चौरी-चौरा के शहीदों का योगदान…
गरिमा संजय

बात अब हो चुकी पुरानी, पर घाव अब भी रिस रहे,
अतीत के अनुभव कहीं दर्द, कहीं अश्रु बन छलक रहे।

1757 में प्लासी के युद्ध के बाद से ही, ब्रिटिश जैसे-जैसे भारत में अपने पाँव पसार रहे थे, भारतीयों पर नए तरह के अत्याचार शुरू होने लगे थे। उनकी सत्ता न मानने वालों को कहीं तोपों से बाँधकर उड़ा दिया जाता, तो कहीं सरेआम फाँसी के फंदों पर लटका
दिया जाता। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम तक नर-संहार आम बात बन चुकी थी! देश विदेशी बर्बरता में झुलसने लगा था।
हालाँकि, हमेशा से अंग्रेज़ों का मुख्य उद्देश्य भारत का आर्थिक दोहन ही था, लेकिन इसके लिए उन्होंने शुरू से ही ऐसे हथकंडे अपनाये जिनसे देश के राजनीतिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक स्तर बुरी तरह प्रभावित होने लगे थे।
अंग्रेज़ ऐसी नीतियाँ अपना रहे थे, जिनसे भारतीयों के आजीविका के साधन ही ख़त्म हो रहे थे। छोटे-बड़े उद्योग बंद हो रहे थे, व्यवसाय ठप्प होने लगे थे। शिक्षा में ऐसे बदलाव किये जा रहे थे जिनसे भारतीयों की मानसिकता को भी ग़ुलाम बनाया जा सके। ग़ुलामी की शिक्षा हमारी जड़ें खोदने लगी थीं।
दूसरी ओर, भारतीय किसानों पर ब्रिटिश नीतियों का बहुत ही भीषण प्रभाव पड़ रहा था।
अंग्रेज़ उन्हें मजबूर करते कि वे अपनी पारंपरिक फसलें छोड़कर केवल वे फसलें उगाएँ जिनसे अंग्रेज़ी हुकूमत का खज़ाना भरा जा सके, जिनसे ब्रिटिश उद्योगों के लिए कम कीमत पर कच्चा माल जुटाया जा सके। अनाज, तिलहन, दलहन की जगह अब चाय, कॉफ़ी, इंडिगो और ओपियम उगाना ज़रूरी होने लगा था। नतीजन, किसानों के पास अनाज की कमी होने लगी, वहीं बड़ी मात्रा में लगान भरने से उनकी पूँजी भी नष्ट होने लगी।

चारों ओर ग़रीबी और भुखमरी फैलने लगी। आर्थिक दोहन भारतीय जनता को तोड़ने लगा। भूख और ग़रीबी बीमारी बन घर करने लगी, रोज़गार के अभाव में अंग्रेज़ों की ग़ुलामी ही जनता की मजबूरी बन चुकी थी। नष्ट होते उद्योग और बर्बाद कृषि के परिणामस्वरूप, विद्वानों की धरती के सपूत अंग्रेज़ों की चाकरी करने को मजबूर होने लगे थे…
किसी अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के लिए दस वर्ष का स्वार्थी शासन ही काफ़ी होता है, फिर अंग्रेज़ तो अब तक सौ वर्ष से अधिक समय से देश का आर्थिक दोहन कर रहे थे।
अट्ठारहवीं सदी से शुरू हुआ बर्बादी का सिलसिला हमें बीसवीं सदी की शुरुआत तक ले आया था… जब, सोने की चिड़िया कहलाने वाला हमारा देश ग़रीबी, भुखमरी का घर बन चुका था। अक्सर कोई क्षेत्र अकाल-ग्रस्त हो जाता, तो कहीं प्लेग जैसी महामारी फैलती। लेकिन विदेशी शासन इससे क्यों प्रभावित होता?
जनता का दर्द आक्रोश बन उभरने लगा था। यदा-कदा कुछ विरोध भी होते, किन्तु उनका आसानी से दमन कर लिया जाता। आर्थिक रूप से कमज़ोर करके पहले ही भारतीयों को बेहाल रखा गया था, उसपर, भेदभाव की नीतियाँ अपनाकर अंग्रेज़ उनकी एकता को भी तोड़ते रहते थे।
पहले सांप्रदायिक आधार पर बंग-विभाजन किया गया, फिर विश्व-युद्ध में भारतीयों का भरपूर सहयोग पाने के बदले में उन्हें जलियाँवाला बाग़ की वीभत्स त्रासदी दी। विरोध के स्वर उपजते नहीं, कि उन्हें कुचल दिया जाता। न जाने कितने भारतीयों को बीच बाज़ार पेड़ों पर लटकाकर फांसी दे दी जाती, और उनका नेतृत्व कर रहे साहसियों को या तो जेलों में डाल कर प्रताड़ित किया जाता या फिर सीधे मौत के घाट उतार दिया जाता।
जन-जन पीड़ा और आक्रोश से जल रहा था, दमन की आग से देश का अंतर्मन झुलस रहा था, जब 1920 में गाँधी जी के असहयोग आंदोलन ने भारतीयों के हृदय में आशा की नई किरण जगाई। अपनी बची-खुची रोज़ी-रोटी की भी चिंता किये बगैर, सारे भारतवासी इस उम्मीद में आंदोलन में शामिल हो गए, कि असहयोग आंदोलन के ज़रिये एक साल में अंग्रेज़ी हुकूमत की जड़ें हिल जाएँगी और भारत को आज़ादी मिल जाएगी!
किन्तु ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेज़ों का दमन जारी रहा। असहयोग के चलते रोज़ी-रोटी के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा भी दांव पर लगी हुई थी। दिलों में उबाल बढ़ने लगा था… फिर भी, गाँधी जी की पुकार पर शांतिपूर्ण आंदोलन ही जारी रहा।
सितंबर 1920 से फ़रवरी 1922 आ चुका था, इन डेढ़ वर्षों में देशवासियों को परिणाम में केवल आर्थिक तंगी और बीमारियाँ ही मिल रही थीं।

पीड़ित जनता फिर भी धीरज के साथ शांतिपूर्ण मार्च निकाल रही थी, जब गोरखपुर के चौरी-चौरा क्षेत्र में अनहोनी घट गई। पुलिस ने उनके दो नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया था। भीड़ पुलिस थाने की ओर शांतिपूर्ण ढंग से बढ़ रही थी, कि शासन के आदेश पर पुलिस ने गोलियाँ बरसा दीं।

भूख और ग़रीबी के हालातों में औपनिवेशिक ग़ुलामी से आज़ादी पाने का सपना अब उद्विग्न होने लगा था। कहीं न कहीं जलियाँवाला बाग़ की घटना की पुनरावृत्ति भी डरा रही होगी। गोलीबारी से बेक़ाबू भीड़ पीछे हटने के बजाय पुलिस थाने की ओर बढ़ती रही और अनेक आंदोलनकारियों की मौत हो गई, अनेक घायल हो गए। इसी बीच पुलिस की गोलियाँ ख़त्म हो गईं और वे थाने में छुप गए।
आक्रोश, भय के बहाव में भीड़ का धीरज खो गया और उन्होंने अपनी मशालों से पुलिस थाने में आग लगा दी… उधर, थाने के अंदर भी अपने भारतीय पुलिसकर्मी ही दम तोड़ रहे थे और
इधर, थाने के बाहर आम भारतीय जनता दम तोड़ रही थी। साथ ही, दम तोड़ रहा था, आज़ादी का वह सपना जो करोड़ों दिलों में असहयोग आंदोलन बनकर पल रहा था। नियति ठठाकर हँस रही होगी, जब करोड़ों दिलों से रक्तिम अश्रु-धारा बह रही होगी।
असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया। चौरी-चौरा काण्ड के आरोपियों पर मुकद्दमा चला…
वकालत छोड़ चुके पंडित मदन मोहन मालवीय ने आरोपियों को बचाने के लिए कमर-कसी और मृत्युदंड के 172 आरोपियों में से 153 को बचाने में सफल हुए।
सच है, कि एक और सपना टूटा था, लेकिन हौसले हारे नहीं थे। बल्कि, आम भारतवासियों के इस जोश ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नई राह दिखाई, एक नई दिशा दी।
इतिहास के पन्नों में खो गए इन अमर शहीदों की कुर्बानियाँ बेकार नहीं गई। युगों पुरानी सभ्यता और संस्कारों से सिंचित भारत की इस धरती ने आज स्पष्ट सन्देश दिया था… “अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च: l”
सच है कि अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है, किन्तु अधर्म का नाश भी अनिवार्य है!
अहिंसा और सद्भाव ही है धर्म हमारा, किन्तु कमज़ोर बन अत्याचार सहना भी अधर्म ही है।
विदेशी आक्रान्ताओं का साथ दे, ऐसा भाई भी, किसी कीमत पर अब हमें स्वीकार नहीं!
यज्ञ की ज्वाला सी, चौरी-चौरा की धरती से उठीं क्रांति की चिंगारियाँ देश के कोने-कोने में सुलग उठीं। बालक, युवा, वृद्ध… महिला हों या पुरुष… स्वाधीनता के उस यज्ञ में आहुति देने उमड़ पड़े… हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन जैसे संगठनों का गठन हुआ, और राजगुरु, भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक़उल्ला खान, चंद्रशेखर आज़ाद, ठाकुर रोशन सिंह, सूर्यसेन जैसे अनेक राष्ट्रवादी आज़ादी की राह में परवान होने निकल पड़े…
काकोरी में ब्रिटिश ख़ज़ाना लूटकर, तो कभी दिल्ली असेम्बली में बम गिराकर – पूरे देश में जगह-जगह, विरोध के स्वर तेज़ होने लगे…
विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने की कोशिशें बढ़ने लगी!
करोड़ों भारतवासियों के संघर्ष और बलिदान के बाद, अनेक यातनाएँ सहने के बाद, अनगिनत शहीदों के त्याग के बाद, आख़िरकार, देश आज़ाद हुआ।
चौरी-चौरा के गुमनाम शहीदों को आज़ादी के 25 साल बाद पहली बार पहचान मिली, जब 1973 में, स्थानीय लोगों ने ख़ुद भारत माँ के इन सपूतों की याद में एक स्मारक का निर्माण करवाया… जिन्होंने आज़ादी के प्रयासों को एक नई दिशा दी!
आज, सौ साल बाद… जब चौरी-चौरा में भी बहुत कुछ बदल गया है। यहाँ की मिट्टी आज भी अपने साहसी सपूतों के रक्त से नम है।

भारत की आज़ादी के लिए देश पर कुर्बान होने वाले सैकड़ों राष्ट्रभक्त आज भी गुमनामी के अँधेरों में गुम हैं। इस मिट्टी में मिट जाने वाले अनगिनत शहीद आज आज़ाद भारतवासियों के बीच अपनी शहादत की पहचान ढूँढ रहे हैं। जिनके रक्त ने कभी इस धरती को नहलाया था, आज उनके ख़ामोश आँसू इसे भिंगो रहे हैं।

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