काव्य भाषा : अवरोधकों से बचना होगा – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

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अवरोधकों से बचना होगा

छल *फरेब* धोखा,
पीठ पर वार,
आस्तीन में पल कर
आस्तीन को डसने
और थाली में छेद करने का फ़न….
यकीनन
इन कुटिल शब्दों के डंक से
आहत हुए होंगें हम सब
कभी न कभी
अपने जीवनकाल में।

हाँ!!
कुछ लोग
अछूते भी रह सकते है
इन कुटिल शब्दों के प्रहार से…
क्योंकि ये शब्द
कोई छूत का रोग तो है नही
जो इनके संपर्क में आते ही
ग्रस्त हो जाएं
हमारे मौलिक और निर्मल निश्चल विचार…।

इन शब्दों का शिकार
तो होते हैं वही लोग,
जो रहते हैं भीतर से कमजोर,
और जिन्हें रहता नही है
अपने आत्मबल पर यकीन…।
यकीनन उन्हें ही रिझाती है
स्वार्थपरस्त सपेरों की बीन..।

छल *फरेब* धोखा
पीठ पर वार
और आस्तीन में रहकर
आस्तीनों को डसने के फ़नों में
माहिर होते हैं
सिर्फ कुछ शातिर दिमाग वाले स्वयंभू
तानाशाही सोच वाले मुखोटे।
जो अपनी कुतिस्त चालों से
महज अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए
अपने दाँव पेंच दिखलाकर
करते रहते हैं
सीधे-सादे लोगों को अपनी भीड़ में शामिल…।

भीड़
जिसका कोई मौलिक चेहरा नही होता।
जिसका कोई मौलिक धर्म नही होता।
जिसका कोई मौलिक उद्देश्य या लक्ष्य नही होता….।
दौड़ता है इनकी रगो में
सिर्फ उन्मादी खून
हावी होता है इनके सिरों पर
भाईचारे के माहौल में
फसाद फैलाने का जुनून।

बहुत जरूरी है
अपने घर की/समाज की/देश की
एकता अखंडता और शांति
बरकरार रखने के लिए
हम जागरूक रहें हर पल।

और बहुत ही जरूरी है
*फरेबी* मानसिकता से ग्रस्त
षड्यंत्रकारियों के मोहपाश में
बंधने से
बचाये रखें अपना वर्तमान और आने वाला कल…।

छल *फरेब* धोखा
जैसे दुराचारी शब्द
हमारे आत्मिक सफर के
ऐसे अवरोधक हैं
जो हमारी बेध्यानी से हमें
गर्त की ओर ले जाते हैं…।
जहाँ से चाह कर भी हम
फिर कभी मौलिक जीवन की ओर
लौट नही पाते हैं,
बहुत पछताते हैं….।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

1 COMMENT

  1. बहुत ही प्रासंगिक रचना ।बहुत कुछ सोचने पर हमें मजबूर करती और वर्तमान परिस्थितियों में एक बहुत ही सार्थक रचना है जो आज की परिस्थितियों के सर्वथा अनुकूल है और हमें सजग और सचेत करती है ।
    बहुत-बहुत बधाइयां ।
    👏👏👏🌹🌹🌹👏👏👏

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