काव्य भाषा : गुलाब अब भी महकते क्यों है – नीलम द्विवेदी रायपुर ,छत्तीसगढ़

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गुलाब अब भी महकते क्यों हैं

दिल के जज़्बात पिघलकर,
आँखो से बरसते क्यों हैं,
मेरी पलकों से गिरकर,
गालों पे अटकते क्यों है।

जो न पोछेगा उसी के खातिर ,
मेरे आँसू कुछ देर ठहरते क्यों है,
दर्द भी हिचकियों में बंधकर,
अब चुपचाप सिसकते क्यों है।

वो जो दे जायेगा आकर,
फिर सौगात में कितने आँसू ,
उसके आने की दुआ माँगकर,
नयन पलकें बिछाते क्यों हैं।

जो रिश्ते कभी बने ही नहीं,
होने का अहसास जताते क्यों हैं,
मेरे ख्यालों की दुनिया में आकर ,
फिर टूटकर वो बिखरते क्यूँ हैं।

खुश्बू आती है सूखे हुए गुलाबों से,
ये फूल अब भी तरोताजा क्यों हैं,
मेरी किताब के पन्नों में छिपकर,
तेरे गुलाब अब भी महकते क्यों हैं।

नीलम द्विवेदी
रायपुर ,छत्तीसगढ़

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