काव्य भाषा : वही बनता अभिजीत – एस के कपूर “श्री हंस” बरेली

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जो गिर कर उठता बार बार
वही बनता अभिजीत है

गिर गिर कर फिर भी तुम
संभलना सीखो।
डूब कर भी तुम दुबारा
उबरना सीखो।।
विनाश नहीं सृजन ही तो
होता है जीवन।
मिट भी जाये गर तो फिर
से लिखना सीखो।।

बिखर कर दुबारा निखरना
ही तो जीत है।
सदा आगे की सोचो जो
बीत गया अतीत है।।
हमारी सोच आत्म विश्वास
मीत हैं सबसे बड़े।
जो निकलता भय से आगे
बनता अभिजीत है।।

मुश्किल तो भी कुछ अच्छा
अच्छा गुनगुनाओ तुम।
तकलीफ में भी जरा सा
मुस्कराओ तुम।।
जीवन इक गीत की तरह
सोचो कैसे गाना है।
हर परिस्थिति को खूबसूरती
से निभाओ तुम।।

व्यक्तित्व की अलग इक
अपनी वाणी होती है।
वक़्त खिलाफ में ही तेरी
याद कहानी होती है।।
धारा के विपरीत पता चलता
आंतरिक शक्ति का।
तब तेरी निर्णय क्षमता फिर
पहचान निशानी होती है।।

एस के कपूर “श्री हंस”
बरेली।

मोब।। 9897071046
8218685464

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