काव्य भाषा : एकांत जीवन – राजीव रंजन शुक्ल पटना

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एकांत जीवन

बहुतों का है मानना
अच्छा होता है कभी कभी एकांत मे होना
पर शायद बहुतों का यह भी होगा मत
“एकांत जीवन है व्यर्थ” से होंगे सहमत
एकांत है एक सजा
नहीं हो सकता यह कभी अच्छा
तन-मन-प्राण होता व्याकुल
हर्ष उल्लास का नहीं रहता मन मे निवास
मन की खुशी हो जाती कोसों दूर
दीवारों को ताकने और उससे ही बात करने को होते मजबूर
व्याकुल मन बना देता हर भावनाओं को भाँप
एकांत जीवन लगने लगता है एक ईश्वरीय श्राप
एकांत मे लगता है जीवन करता क्रंदन गान
कैसे कोई कह सकता इसे वरदान
मौन भी मुखरित हो जीवन को चिढ़ाता
कहाँ किसी को कुछ भी साझा कर पता
अवसाद का बनता कारण
हर्ष और खुशियों का कर हरण
कितना भी हो माध्यम आधुनिक संवाद का
नहीं कर सकता प्रतिस्थापन
एक साथ रहकर हास परिहास और संवाद का
बात हो विषाद या हर्ष की
पूर्ण नहीं लगता जीवन बिन अपनों के बात की
जागते रहने पर भी जीवन लगता है सुप्ते
भावों के आदान –प्रदान की संभावना है विलुप्त
जीवन का नहीं लगता कोई अर्थ
एकांत जीवन को बनाता व्यर्थ
मिले नहीं किसी को जीवन मे एकांत
एकांत शब्द का ही शब्दकोश से हो अंत

राजीव रंजन शुक्ल
पटना

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