समीक्षा : माँ पर केंद्रित काव्य संग्रह है ‘ आहट फिर आज तेरी ‘ -डॉ.जितेन्द्र प्रसाद माथुर,जयपुर

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पुस्तक समीक्षा .
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पुस्तक – “आहट फिर आज तेरी”.
(माँ पर केंद्रित काव्य संग्रह).

लेखिका – ” कल्पना गोयल. ”

प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर.

मूल्य – रुपये -150/_
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“माँ” एक सुखद अनुभूति है। वह एक शीतल आवरण है जो हमारे दुःख, तकलीफ की तपिश को ढक देती है। उसका होना, हमें जीवन की हर लड़ाई को लड़ने की शक्ति देता रहता है। सच में, शब्दों से परे है माँ की परिभाषा।
“आहट फिर आज तेरी” काव्य संग्रह में इसी को साकार रूप देने का प्रयत्न किया है “कल्पना गोयल” जी ने ।
हर पल को इन्होंने माँ के आँचल से बाँधा है। माँ से स्नेह तो सभी करते हैं पर कल्पना जी ने माँ की आत्मियता कब कब कैसे कैसे महसूस की है उन सभी लम्हों को कलम की नोक से कागज पर उतार दिया है और वही मूर्त रूप इस काव्य- संग्रह के रूप में प्रस्तुत किया है।
माँ शब्द के अर्थ को उपमाओं अथवा शब्दों की सीमा में बाँधना संभव नहीं है क्योंकि इस शब्द में ही संपूर्ण ब्रह्मांड, सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य समाया है। माँ हर व्यक्ति के जीवन में उसकी प्रथम गुरु होती है, उसे विभिन्न रूपों-स्वरूपों में पूजा जाता है। कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में मातृ ऋण से मुक्त नहीं हो सकता। भारतीय संस्कृति में जननी एवं जन्मभूमि दोनों को ही माँ का स्थान दिया गया है।
माँ के रहते जब कल्पना जी उनके स्नेह से प्रभावित थीं तभी से उनके कल्पना लोक की उपज थी वो माँ जो हर पल उन्हें अपने से अलग नहीं होने देंगी। जैसा कि उनकी कुछ रचनाओं से व्यक्त होता है तभी तो विवाह उपरांत भी कल्पना जी ने माँ को अपनी यादों में सहेज कर रखा जिसे उनके चले जाने के उपरांत अपनी रचनाओं के माध्यम से फिर से जीवित कर दिया।
इनकी कुछ रचनाएँ भावपूर्ण हैं तो कुछ रचनाओं में प्रयोगवादी पुट भी महसूस किया जा सकता है।
माँ के समीप रहकर उसकी सेवा करके, उसके शुभवचनों,शुभाशीष से जो आनंद प्राप्त किया जा सकता है वह अवर्णनीय है। पर कल्पना जी ने कुछ कविता के माध्यम से उसे भी चित्रित किया है जो बहुत कम देखने में आता है। अपने दिए स्नेह के सागर के बदले माँ बच्चों से कुछ नहीं चाहती। वह हर हाल में केवल बच्चों का हित सोचती है, यहाँ बेटी भी माँ को हर हाल में उन्हें खुश देखना चाहती है ।

माँ! तुम नहीं तो….
सब कुछ खो गया है।।

जीवन के उथल-पुथल पर मार्मिक संदेशों को काव्य-विधा के माध्यम से प्रस्तुत करने में माहिर , “कल्पना गोयल ” जी के जीवन के दो पक्षों को (माँ के साथ और माँ के बाद ) को एक साथ लेकर परिचित नये पुराने शब्दों से जीवन का गहरा अर्थबोध लिए है “आहट फिर आज तेरी ” ।
अधिकांश काव्य रचनाओं में पुरुष प्रधान तत्व द्रष्टिगत होते हैं वहीं इनकी काव्य रचनाओं में स्त्री की बोध गम्मयता प्रभावशील है। शब्दों की अर्थ सम्प्रेषणीयता में इस संग्रह के आकार प्रकार जीवन से जुड़े सांगोपांग चितराम जैसे है ।
इनकी कविताओं से गुजरते जब बात रागात्मक भावों की आती है तो अनायास ही मन में एक गहरी उत्सुकता जागती सी प्रतीत होती है जो मानवीय रिश्तों को एक नया ही रूप हमारे सामने प्रस्तुत करती है ।।
कल्पना जी की कविताओं में वैचारिक परिपक्वता जहाँ दृष्टिगोचर होती है वहीं कुछ कविताएं दिल की बेचैनियों को अपने में समाये हुए है ।
कविता वह एक स्वर है जो मुश्किल समय में जीवन की परिभाषा में ढालते हुए अपनी ताक़त का अहसास कराता है ।
इस संग्रह में माँ के रिश्ते को जिस खूबसूरती और समर्पित भावों के साथ उजागर किया गया है वह बहुत ही कम देखने को मिलता है। जीवन के मंथन से भावों के मक्खन को कविता में सँजोना हर किसी के बस की बात नहीं होती ।।
इनकी बेहद खूबसूरत रचनाओं में ओ माँ देखो ना, आशीष तुम्हारा, कल भिजवा देना, याद है मुझे, सन्नाटो के शहर में, माँ बिन कैसा होता जीवन, नमन तुम्हें और कह दे मुझको बस इतना विशेष उल्लेखनीय है।
पुस्तक आकर्षक रंगरूप लिए है कुछ स्थानों पर शब्दों की अशुद्धियाँ और तालमेल की कमी के अतिरिक्त यह पुस्तक जीवन में माँ के महत्व को दर्शाने की तीव्र चाह का बेजोड़ नमूना है।
कल्पना जी को मेरी शुभकामनाएं एवं बधाई ! साहित्य के क्षेत्र में ये और आगे बढ़ें , खुश रहें निरन्तर लिखती रहें, इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देता हूँ ।

डॉ.जितेन्द्र प्रसाद माथुर.
121/180 ,अग्रवाल फार्म ,
मानसरोवर , जयपुर ,
पिन-302020 , राजस्थान

1 COMMENT

  1. बहुत ही दिल से लिखी कवितायें,
    हर माँ ख़ास होती है
    पर ममता को समर्पित ये अनुपम
    कविताओं का संकलन है …..
    बधाई कल्पना जी 👍

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