लघुकथा : दादू का ख़त – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

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दादू का ख़त लघुकथा

मेरी सबसे प्यारी बिटिया रानी *कोमल*
ढेर सारा प्यार-दुलार
आज तुम्हें बिना बताए मैं तुमसे दूर जा रहा हूँ… पर इतना भी दूर नही कि, तुम पर नजर न रख सकूँ…मेरे न रहने पर माँ पापा का ख्याल रखना है तुम्हे।घर की जिम्मेदारी अब तुम पर है…ठीक है ना…।
तुम तो अच्छी तरह जानती हो कि,तुम्हारे जन्म से लेकर अब तक मैं तुम्हारे हर जन्मदिन पर तुम्हें आशीर्वाद देने के लिए…तुम्हारे सिर पर हाथ फेर कर तुम्हे प्रोत्साहित करने के लिए उपस्थित रहता था।मुँहमाँगा गिफ्ट भी तो देता था तुम्हे…तब गिफ्ट लेकर तुम मेरे गले लग जाया करती थी।इसका एहसास ही तो मुझे ये *खत* लिखने पर विवश कर रहा है।
यह पहला अवसर है जब आज के ही दिन मुझे तुमसे बहुत दूर जाना पड़ रहा है।ऊपर वाले का बुलावा आ गया है ना…।
देखो लाडो….!तुम मुझे पास न पाकर नाराज नही होना।आँख बंद करके मुझे याद भर कर लेना…तुम्हारा दादू आस-पास ही शाबाशियाँ देता,मुस्कुराता नजर आ जायेगा।जानती हो लाडो अब मैं महसूस करने वाली चीज हो गया हूँ।पर अदृश्य रह कर भी मैं हमेशा कठिनाइयों में तुम्हारी मदद करता रहूंगा।अरे उंगली पकड़ कर चलना सिखाया है तुम्हे…ऐसे ही अकेला भला छोड़ कर जा सकता हूँ मैं…।
वो तो आठ साल हो गए थे तुम्हारी दादी से बिछड़े…हर रात वह बुलाती थी मुझे…और मैं कभी तुम्हारी और कभी युवराज की जिम्मेदारी का तर्क देकर मोहलत मांग लेता था।कहता था कुछ बन जाए मेरी बिटिया रानी मेरी आँखों के सामने…।
पता है..इस बार भी मांगी थी मोहलत…पर दादी कहने लगी कब तक उसे अपने पैरों पर खड़े नही होने दोगे..।कहने लगी अब वो बच्ची नही रही…।जीने दो इसे अपना जीवन…बनने दो इसे आत्मनिर्भर…त्याग दो इसका मोह और आ जाओ मेरे पास ..हम यहीं से इसे आशीर्वाद देंगे…दुआएँ देंगे..।जोर देकर कहने लगी कि,वैसे भी बचपन से लेकर अब तक तुमने बहुत मेहनत की है इसे मनचाहे कैरियर में आगे बढ़ाने के लिए…।सुबह-सुबह मुँह अंधेरे जगाना ,खेल के मैदान में ले जाना ..प्रेक्टिस करवाना..फिर स्कूल छोड़ने जाना…लेने जाना…।सब तो किया है तुमने इसके उज्ज्वल भविष्य के लिए…।तुम्हारे दिए संस्कारों की बदौलत ही इसने हर मैदान फतह करना सीखा…अनगिनत ट्राफियां हासिल की …।अब और क्या चाहिए तुम्हे…इससे आगे का भविष्य वह खुद सँवारेगी।तुम्हारी दादी कहने लगी तुम्हारे बिना मैं भी तो बहुत अकेली हूँ आठ सालों से…अब सबकी चिंता छोड़ो और आ जाओ मेरे पास।
सच कहूं तो इस बार तुम्हारी दादी जिद पर ही अड़ गई।और मैं भी उसका कहा टाल न सका…चला आया तुम लोगों से दूर बहुत दूर यहॉं दादी के पास सदा के लिये…।
देखो बेटा,तुम उदास बिल्कुल नही होना और न ही किसी को उदास होने देना।अपने लक्ष्य को कभी मत भूलना..।खूब मेहनत करना…।हर क्षेत्र में माँ पापा का नाम..अपने प्यारे दद्दू का, दादी का नाम रौशन करना..।
अच्छा बताओ तो आज गिफ्ट में क्या चाहिये तुम्हें…पर कान में बताना..पापा नाराज हो जाएंगे।उनका मानना है कि,मैंने तुम्हे सिर पर चढ़ा रखा है।तो फिर बताओ चुपके से….ठीक है मैं समझ गया।तुम्हारी ख्वाहिश जरूर पूरी होगी।
अच्छा अब चलता हूँ तुम्हारी दादी के पास…बुला रही है मुझे.. कहती है इतने लंबे अरसे बाद आये हो अब भी बिटिया से ही लगे हो बतियाने..।ताना देते हुए कहती है इतने सालों में तुम्हारा दिल नही भरा क्या…
अब उसे कैसे समझाऊँ बच्चों के लाड़ प्यार से भी कभी किसी का दिल भरा है आजतक..।बच्चों का भर जाता है।छोटा होता है ना.. ।कोई बात नही.. उम्र के साथ सबका दिल बड़ा हो ही जाता है।
अच्छा अब आखिरी बात.. ये खत जरूर पढ़ना… तुम्हें हौंसला मिलेगा और मुझे सुकून।ठीक है…रोना बिल्कुल भी नही…न किसी को रोने देना…।आज जन्मदिन है तुम्हारा.. खुशी खुशी मनाना।मेरा आशीर्वाद मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं…और हमेशा रहेंगी।
और हाँ… हॉल में जो ट्रॉफियां रखी हैं ना.. उनमें बढ़ोत्तरी होती रहनी चाहिए।लापरवाही बिल्कुल नही करना…।
अब अलविदा लेता हूं।बस बर्थ डे केक जरूर काटना..मैं तुम्हारी दादी के साथ यहीं से *हैप्पी बर्थ डे* बोल कर तुम्हे विश करूंगा…।

तुम्हारा दादू दद्दू..तुम्हारा हितैषी… तुम्हारा गार्जियन और सभी कुछ…
“पापा….!!मम्मी…!!इधर आइये….देखिये दादू को क्या हुआ…।”कोमल सुबकते-सुबकते डबडबाई आँखों को पोंछते हुए ऊपर के कमरे में सो रहे अपने मम्मी -पापा को आवाज देने के साथ-साथ दादू के निर्जीव शरीर को झंझोड़े जा रही थी।उनके सीने पर रखी डायरी का वह पृष्ठ अभी भी उसके सामने फड़फड़ा रहा था…।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

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