काव्य भाषा : उपहार – कुन्ना चौधरी, जयपुर

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उपहार

माता पिता ने दिया हमें जीवन उपहार ,
पंचतत्व है क़ुदरत का अद्भुत उपहार,
काल परिस्थितियाँ मिलते प्रारब्ध से माना ,
मानवता है संस्कृति का अनमोल उपहार….

उपहार लेने देने की प्रथा है पुरानी,
फूल के तोहफ़े से शुरू हो जाती कहानी,
दिखावे और आडम्बर से बिगड़ रहा प्रचलन,
होड़ के बाज़ार में हो रही दुनिया दिवानी …..

उपहार पाना है एक सुखद एहसास,
उपहार देने से मिलता अलौकिक सुख ,
ज़रूरी नहीं हो तोहफ़ा क़ीमती बहुत ,
उत्तम है जो हम बाँट सके किसी का दुख….

अपेक्षा उपेक्षा से परे जब देता कोई उपहार ,
लेने और देने वाले दोनों के मन होता आभार,
प्रेम की भेंट का नहीं होता कोई विकल्प,
यादें बन दिल के क़रीब रह जाते कुछ उपहार ….

जब अपना कुछ हम बाँटते है औरों से ,
लगता हम कर रहे दीनानाथ का काम ,
स्वयं के लिये जीना भी कोई जीना है ,
निःस्वार्थ सेवा से चलता है धर्म का नाम ….

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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