‘ बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा ‘ मंहगाई, सुरसा और हम – वर्षा सिंह,सागर

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

मंहगाई, सुरसा और हम

-वर्षा सिंह

26 जनवरी से लगातार कुछ अन्य अहम मुद्दों के साथ ही समाचारों में यही पढ़ने-सुनने को मिल रहा है, यही चर्चा हो रही है कि देश के सभी राज्यों में पेट्रोल के दाम अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ कर उच्चतम स्थिति में पहुंच गए हैं। मध्यप्रदेश में तो मानों पेट्रोल और डीजल के दाम में आग ही लग गई है। राज्य की राजधानी भोपाल सहित मध्यप्रदेश के चारों प्रमुख महानगरों यानी भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में पेट्रोल के रेट 90 रुपये प्रति लीटर का आंकड़ा पार कर चुके हैं। जी हां, ऐसा पहली बार हुआ है जब पेट्रोल के दाम 90 रुपये प्रति लीटर से भी ज्यादा हुए हैं। वहीं डीजल भी 81 रुपये प्रति लीटर के क़रीब पहुंच गया है। पेट्रोल और डीजल के दाम में हुई इस बढ़ोतरी से स्वाभाविक है कि ट्रांसपोर्टेशन पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ने के कारण अन्य आवश्यक वस्तुओं के दामों में भी बढ़ोत्तरी हो जाएगी। और इसीलिए यह जुमला या कहिए कि यह कहावत सुनने को मिल रही है कि मंहगाई सुरसा बन गई है।
बेतहाशा बढ़ती कीमतें हों या बेरोज़गारी जैसी समस्याएं… अक्सर ही इन्हें सुरसा या सुरसा का मुंह सरीखी उपमाएं दी जाती हैं। दरअसल सुरसा रामकथा की एक महिला पात्र का नाम है, जिसका वर्णन हनुमान से संबंधित एक घटना के संदर्भ में वाल्मीकिकृत रामायण और तुलसीदासकृत रामचरितमानस सहित अन्य अनेक रामकथाओं में मिलता है।
सुरसा समुद्र में रहने वाले नागों की माता थी। लंकाधिपति रावण द्वारा सीता को अपहृत कर लेने पर राम और लक्ष्मण वन में सीता को खोजते हुए जब किष्किंधा पहुंचे तो वहां उनका परिचय हनुमान से हुआ, जो सुग्रीव के मित्र थे। सुग्रीव के बड़े भाई किष्किंधा के राजा बालि ने अपनी शक्ति के बल पर दुदुंभी, मायावी और रावण को परास्त कर दिया था। दुराचारी बालि ने अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी को बलपूर्वक अपने आधीन रख लिया था और विरोध करने पर सुग्रीव को अपने राज्य से बाहर निकाल दिया था। हनुमान ने सुग्रीव को राम से मिलाया। सुग्रीव ने अपनी पीड़ा बताई तब बालि और उसके छोटे भाई सुग्रीव के मल्ल युद्ध के समय राम की सहायता से सुग्रीव ने बालि पर विजय हासिल की और सीता की खोज में राम की सहायता करने का वचन दिया। सुग्रीव ने सीता की खोज करने के लिए चारों ओर वानर भेजे। पहले जटायु और तत्पश्चात सम्पाती द्वारा यह बताने पर कि सीता को लंकापति रावण ने अपहृत किया है, सुग्रीव ने हनुमान को सीता की खोज के लिए दक्षिण दिशा में समुद्र पार लंका की ओर भेजा।
हनुमान अपने साथियों को लेकर चल दिए। समुद्र के किनारे पहुंचकर हनुमान ने जामवन्त आदि अपने साथियों को वहीं रुकने के लिए कहा और वे स्वयं ऊंचे और बलशाली मैनाक पर्वत को अपने अतुलित बल से पार कर समुद्र पार लंका की ओर चल दिए। जब देवताओं ने पवनपुत्र हनुमान को वायुमार्ग से उड़ कर समुद्र पर से जाते हुए देखा तो हनुमान की विशेष बल-बुद्धि की परीक्षा लेने के उद्देश्य से उन्होंने सुरसा नामक महिला को भेजा। रामायण के अनुसार सुरसा समुद्र में स्थित नागलोक में रहने वाले नागों की माता थी। देवताओं के कहने पर सुरसा हनुमान का रास्ता रोकने के लिए हनुमान के समक्ष आ खड़ी हुई। उसने हनुमान से कहा कि मैं भूखी हूं और तुम्हें अपना आहार बनाऊंगी। तब हनुमान ने सीता की खोज में जाने के अपने संकल्प की कथा बता कर, हाथ जोड़कर रास्ता छोड़ने की प्रार्थना की। किन्तु सुरसा ने उनकी बात नही मानी। तब हनुमान ने सुरसा के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि – “हे नागमाता, अभी मुझे जाने दीजिए। मैं वचन देता हूं कि मैं सीता की खोज करके मैं शीघ्र ही राम को उनका समाचार दे दूंगा, फिर लौट कर आपके पास आऊंगा तब आप मुझे खा लीजिएगा।”
चूंकि सुरसा तो हनुमान की परीक्षा लेने के लिए वचनबद्ध थी अतः उसने हनुमान की बात स्वीकार नहीं की और उन्हें खाने के लिए अपना मुँह फैला दिया। हनुमान वास्तव में बल और बुद्धि में स्वयं अपना उदाहरण आप थे तो उन्होंने सुरसा से छुटकारा पाने के लिए शीघ्र ही एक युक्ति निकाली। हनुमान ने अपने शरीर का आकार इतना बढ़ा लिया कि जिससे सुरसा उन्हें निगल न सके। हनुमान के शरीर का बढ़ा हुआ आकार देख कर सुरसा ने भी अपने मुँह को और अधिक फैला कर बढ़ा लिया। इस तरह हनुमान और सुरसा दोनों ही अपना-अपना आकार बढ़ाते गए। अंत में जब सुरसा का मुंह बहुत ज़्यादा बढ़ा हो गया तोु हनुमान ने अचानक अपना रूपाकार बहुत छोटा कर लिया और फिर सुरसा के बहुत फैले हुए बड़े से मुँह में प्रवेश करके तुरन्त ही बाहर भी आ गए।

सुरसा का मुँह खुला का खुला ही रह गया। हनुमान सुरसा की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए थे अतः सुरसा ने उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया और कार्य में सफल होने का आशीर्वाद दिया।

तुलसीदास ने रामचरितमानस के सुंदरककांड में इस कथा का वर्णन बड़े ही रोचक ढंग से किया है –

जात पवनसुत देवन्ह देखा।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

अर्थात् देवताओं ने पवनपुत्र हनुमान को जाते हुए देखा तो उनकी विशेष बल-बुद्धि को जानने के लिए उन्होंने सुरसा नामक सर्पों की माता को भेजा, उसने आकरt हनुमान से यह बात कही।

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥

अर्थात् आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर पवनकुमार हनुमान ने कहा- राम का कार्य करके मैं लौट आऊं और सीता का समाचार प्रभु को सुना दूं।

तब तव बदन पैठिहउँ आई।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥

अर्थात् तब मैं आकर तुम्हारे मुँह में स्वयं घुस जाऊँगा। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दें। जब किसी भी उपाय से उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान ने कहा- तो फिर मुझे खा क्यों नहीं लेती।

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥

अर्थात् सुरसा ने योजनभर मुँह फैलाया। तब हनुमान्‌जी ने अपने शरीर को उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजन का मुख किया। हनुमान्‌जी तुरंत ही बत्तीस योजन के हो गए।

वस्तुतः योजन दूरी मापने के लिए पौराणिक ईकाई है। 1 योजन दूरी को अधिकतर विद्वानों ने 8 मील माना है। 8 मील 1.61 किलोमीटर के बराबर होते हैं। रामचरितमानस सहित अनेक प्राचीन ग्रंथों में तत्समय प्रचलित दूरी- मापन की इस ईकाई ‘योजन’ का उल्लेख मिलता है।

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥

अर्थात् जैसे-जैसे सुरसा अपने मुख का विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान उसका दूना रूप दिखलाते थे। सुरसा ने सौ योजन का मुख किया। तब हनुमान ने बहुत ही छोटा रूप धारण कर लिया।

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥

अर्थात् हनुमान सुरसा के मुख में घुसकर तुरंत फिर बाहर निकल आए और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। तब सुरसा ने हनुमान से कहा कि मैंने तुम्हारे बुद्धि-बल का भेद पा लिया, जिसके लिए देवताओं ने मुझे भेजा था।

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।

अर्थात् तुम राम का सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धि के भंडार हो। यह आशीर्वाद देकर सुरसा चली गई, तब हनुमान हर्षित होकर आगे चले।

जिस प्रकार सुरसा ने अपने मुंह को फैला कर सैकड़ों किलोमीटर बड़ा कर लिया था उसी प्रकार मंहगाई की समस्या भी प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है। वर्तमान समय में चिन्तामुक्त जीवन जीने के रामकथा को सुनने-पढ़ने से ज़्यादा ज़रूरी है उस पर चिन्तन कर उसके चरित्रों से, उसमें वर्णित घटनाओं से सीख लेने की। पवनपुत्र हनुमान की भांति हम भी सुरसा रूपी मंहगाई को मात देने में सफल हो सकते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि हम अपनी ज़रूरतों को पर्याप्त सीमित कर लें। फ़िज़ूलखर्ची से बचें और अनावश्यक कार्यों में धन व्यय न करें।
बात पेट्रोल के बढ़ते दामों से शुरू हुई थी तो उससे संबंधित अपना एक संस्मरण भी मैं साझा करना चाहूंगी। पहले मेरे कई महिला-पुरुष सहकर्मी रोज़ दोपहर में अपनी बाईक, स्कूटी, मोटरसाइकिल, कार आदि दुपहिया, चारपहिया निजीवाहनों से ऑफिस से लंच के लिए अपने घर जाते थे। हम कुछ लोग जो घर से टिफिन लेकर ऑफिस आते थे, अक्सर उनको समझाते कि यदि आप लोग भी लंचबॉक्स, टिफिन आदि साथ ले कर आएं तो प्रतिदिन लंचटाईम में अनावश्यक आवाजाही, भागदौड़ से बचने के साथ ही फ़ालतू पेट्रोल में धन जाया करने से भी बच जाएंगे। पहले एक- दो को यह बात जमीं और वे लंचबॉक्स ले कर आने लगे फिर एक-एक कर अधिकांश लोग अनुसरण करने लगे। अब वे उस प्रसंग को याद करके हमें धन्यवाद देते हैं।
बाईक या कारपूलिंग से भी पेट्रोल बचाया जा सकता है। जहां किसी परिवार में एक या दो वाहनों से आने-जाने की ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं, वहां घर के हर सदस्य के लिए उसका अपना अलग वाहन कहीं न कहीं फ़िज़ूलखर्ची को ही बढ़ावा देने वाला साबित होता है। टाईमिंग एडजस्टमेंट के द्वारा इससे बचा जा सकता है।
मंहगाई सुरसा बन गई है तो हम हनुमान के दिखाए मार्ग पर चल कर, उनका अनुसरण करके इस सुरसा रूपी निरंतर बढ़ती हुई मंहगाई को परास्त भला क्यों नहीं कर सकते? हम सामान्य जन जो सुरसा के मुंह रूपी मंहगाई की रफ़्तार को कम करने की क्षमता और सामर्थ्य नहीं रखते हैं, राम के अनन्य भक्त हनुमान का अनुसरण कर स्वयं की ज़रूरतों को लघुरुप तो दे ही सकते हैं।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरे ये पांच दोहे –

मंहगाई सुरसा बनी, आप न हों निरुपाय !
पवनपुत्र का आचरण, हमको राह दिखाय ।।

अपने वश में है नहीं, दामों पर कंट्रोल ।
लेकिन वश में है करें, व्यर्थ न व्यय पेट्रोल ।।

समय कठिन यह जानिए, हंस कर करिए पार।
घर, समाज और देश का, होगा तब उद्धार ।।

हम सुधरें और अन्य को, देवें अच्छी सीख ।
शुभ दिन ले कर आएगी, तब हर इक तारीख़ ।।

“वर्षा” संयम से बड़ा, नहीं एक भी मंत्र ।
सरल, सहज जिससे बने, अपना जीवनतंत्र।।

सागर, मध्यप्रदेश

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