लघुकथा : प्राथमिकता – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

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प्राथमिकता

“हैलो… हाँ अनुपम कैसे हो भई,हो गई तुम्हारी तैयारी”
“कैसी तैयारी मित्र”मेरा यह प्रश्न उसको शायद अनपेक्षित सा लगा।
“क्या वाकई तुम कल का आयोजन भूल गए”
“कौन सा आयोजन भाई बताओ तो”
“अरे भई.. कल रविवार है ना… शाम 5 बजे परिषद की ऑन लाइन गोष्ठी है भई गुगल मीट पर….”
“कैसे साहित्य प्रेमी हो तुम… अहम दिन भूल गए…”उसने मुझ पर अपनी साहित्य धर्मिता का गर्वित अंदाज में रौब झाड़ते हुए आश्चर्य व्यक्त किया।
” पिछले सप्ताह ही तो सबने तय किया था मातृत्व दिवस को समर्पित सभी का रचना पाठ होगा।”
“खैर कोई बात नही ,अभी वक्त है ,तैयारी कर लो।वो क्या है कि,संचालन मुझे ही करना है तो सोचा सभी सदस्यों को फोन करके स्मरण करा दूं।बस इसीलिये…”
“ओह!!विद्यापति गृहस्थी के छोटे छोटे कामों के अलावा ऑफिस के काम का भी बोझ कुछ ज्यादा ही है इन दिनों…इसलिये गोष्ठी की बात दिमाग से बिल्कुल निकल ही गई।वैसे भी पिछले तीन चार दिनों से माँ की तबियत भी ठीक नही चल रही है न..।डॉक्टर साहब के परामर्श से ही उपचार हो रहा है,पर रात को उनके कमरे में ही सोना पड़ता है।ऐसे में उन्हें अकेला छोड़ने का मन नही करता।इसलिये भी लेखन और चिंतन करने के लिए वक्त निकाल नही पाया अब तक…।हो सकता है मैं कल की गोष्ठी में शामिल न हो पाऊँ…।माँ पर काव्य सृजन के पहले मुझे उन्हें स्वस्थ रखने के प्रति दायित्व निभाना हैं…विषय पर लेखन के पहले अपनी कथनी और करनी की *प्राथमिकता* तय करना आवश्यक है मित्र…”
“सच कह रहे हो अनुपम माँ से बढ़कर कोई दूसरा नही है संसार में…माँ के त्याग,स्नेह,ममता और समर्पण को परिभाषित करना, उसके मोल को आँकना असंभव है।उसके असीमित प्यार दुलार को शब्दों में संजोना ,उन पर काव्य लिखना सूरज को दीपक दिखाने जैसा है….।
कल सुनाऊंगा माँ को संबोधित करती अपनी उत्कृष्ट और संवेदनशील रचना….तुम कल नही आओगे तो तुम्हे अभी ही सुना देता हूँ..।”
उसका रचना पाठ शुरू ही हुआ था कि,पीछे से आवाज आई। “पापा!!पापा दादी किचन में गिर गई हैं, वह आपके लिए चाय ला रही थी ,उन्हें बहुत चोट लगी है।मम्मी भी पार्लर गई हुई हैं…फोन छोड़िए और जल्दी आइये…” पर उसने शायद बेटे की आवाज सुनी नही या फिर सुन कर अनसुनी कर दी।तभी तो वह धाराप्रवाह मुझे माँ पर केंद्रित अपनी रचना सुनाने में मग्न था।जो उसे कल की गोष्ठी में सुनानी थी।
और मैं… जड़वत सा उसका काव्य वाचन सुनते हुए मन ही मन माँ के प्रति उसके दायित्वों की *प्राथमिकता* का आकलन करने में कहीं खो गया था।
“अरे अनुपम कहाँ खो गए भई …कैसी लगी मातृत्व विशेषांक के लिए मेरी कविता।कुछ कहोगे नही….।”
प्रतिक्रिया देने के लिए मैंने खुद को असहज महसूस किया और मोबाइल बंद करते हुए अपनी माँ के कमरे की ओर चल दिया….।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

1 COMMENT

  1. बहुत ही मार्मिक कहानी।
    हृदय को झकझोरने वाली रचना।
    आधुनिक कलयुगी सन्तानों की बनावटी मातृ-सेवा की पोल खोलने वाली बेहतरीन प्रस्तुति।
    👏👏👏

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