काव्य भाषा : सोच – मयंक शेखर,हजारीबाग

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सोच

क्यों लड़कियों की ज़िंदगी से खेलते है लोग।
क्यों “उसे भी जीने का हक है” नहीं समझते है लोग।।

लड़कियों पर ज़ुल्म की दीवार तोड़ दी जाती है।
खुद पर आए तो आफत सी आ जाती है।।

लड़की को क्यों खिलौना समझते है लोग।
लड़की होना क्यों घिनौना समझते हैं लोग।।

क्यों लोग हमेशा बेटों के पीछे ही भागे है।
जबकि बेटियां, बेटों से भी आगे है।।

हर घर कि आन बान और शान होती है बेटियां।
फिर क्यों सरे आम बदनाम होती है बेटियां।।

क्यों माना जाता है लड़की होना एक अभिशाप है।
क्या बेटा के जगह बेटी होना पाप है।।

जो बेटी कर सकती है वो बेटा ना कर पाएगा।
क्या बेटा कभी एक बेटी बनकर दिखलायेगा।।

बेटियां वो मोमबाती है जो खुद जलती है।
और दो घरों की खुशियां तमाम बदलती है।।

कभी आंसू तो कभी गम के ठोकर सहती है।
ये बेटियां है साहब किसी से कहा कुछ कहती है।।

परन्तु ये बातें कहा कोई सोचता है,
बेटियां हो तो नसीब को कोसता है।।

बेटियां वो नदी है जिनका अपना कोई ठिकाना नहीं होता, पर वो जिस ओर बहती है उसे वो खुशहाल कर देती हैं।।

जब तू ऐसी भयानक भूल जो तू हैवानी से करता है।
तेरे भी घर में बहन बेटी है, तो फिर तू क्यों डरता है।।

जब तू उस हैवानी को करने से ना कतराता है।
तो क्यों अपनी बहन बेटियों को घर में छुपाता है।।

अपनी बहन और बेटियों को अपने घर की नाज़ बताता है।
फिर क्यों उन मासूमों की ज़िन्दगी का मज़ाक बनाता है।।

जो दो घरों की खुशियों का राज़ है।
वहीं क्यों पल पल की खुशियों कि मोहताज है।।

जब बेटी को दुर्गा, लक्ष्मी और चंडी कहकर पुकारते है लोग।
फिर क्यों उन्हें ही अपनी बेटी के रूप में दुत्कारते हैं लोग।।

घर में बेटी हो तो मातम छा जाता है ।
फिर क्यों बहू पारियों जैसी खोजा जाता है।।

अगर सोच ना बदली और ना बदली अभिमान।
तो अंत तेरा निश्चित है ऐ नादान इंसान।।

ये तेरी कैसी सोच है मेरे ए नादान इंसान।
दूसरों पर बीते तो मज़ाक खुद पर बीते तो पाषाण।।

बेटी होना नहीं होता है आसान।
क्यों इतनी – सी बात नहीं समझता है इंसान।।

मयंक शेखर
कुम्हारटोली, हजारीबाग
झारखंड

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