“बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा” बर्ड फ्लू और रामकथा के पक्षी – डॉ. वर्षा सिंह

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

बर्ड फ्लू और रामकथा के पक्षी
– डॉ. वर्षा सिंह

कोरोना से अभी हम मनुष्यों को निज़ात नहीं मिल पाई है और बर्ड फ्लू यानी पक्षियों में इन्फ्लूएंजा वायरस से होने वाली बीमारी के समाचार लगातार आने लगे हैं। हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र सहित देश के दस राज्यों में कौवे, बत्तख, मुर्गियां आदि पक्षी इस जानलेवा वायरस का शिकार हुए हैं। पिछले सप्ताह हरियाणा में बर्ड फ्लू से करीब एक लाख पोल्ट्री बर्ड्स की मौत हो चुकी है। जबकि हिमाचल प्रदेश की पोंग डैम झील के पास पलायन करने वाले करीब 1,800 पक्षी मृत पाए गए हैं। साथ ही राजस्थान के कई जिलों में लगभग 250 से ज़्यादा कौवों की मौत हो चुकी है।
पक्षियों पर संक्रमण संकट के इन समाचारों ने मन को विचलित कर दिया है और विचारों को चिन्तन की दिशा में मोड़ दिया है। मुर्गे की बांग से हमारी भोर होती है, नीलकंठ के दर्शन कर हम शुभलक्षणों वाले दिवस की शुरूआत करने की लालसा रखते हैं और कोयल के मधुर स्वर से आनंदित होते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष में कौओं के बिना श्राद्ध पूरा नहीं होता। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो पक्षी हमारे इकोसिस्टम को संतुलित करते हैं। बीज प्रसार में पक्षियों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। पक्षी पौधे के फल या बीज खाते हैं। उनमें से कुछ बीज इस तरह उत्सर्जित होते हैं कि जब वे बीज जमीन पर पहुंचते हैं, तो अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित हो जाते हैं। कौवे और गिद्ध जैसे पक्षी मृत पशुओं को अपना आहार बना कर पर्यावरण की शुद्धता, साफ़-सफ़ाई में अपना योगदान देते हैं, जबकि छोटे पक्षी ज़हरीले कीट आदि का भक्षण कर हमें सुरक्षा प्रदान करते हैं। कुछ पक्षी जैसे तीतर, बटेर, बत्तख, मुर्गियों आदि के अंडे, चिकन आदि मांसाहारी मनुष्यों के आहार का अंग हैं। बर्ड फ्लू से संक्रमित पक्षियों को खाने से मनुष्यों में भी संक्रमण का ख़तरा बना हुआ है। देश में मनुष्यों में कोरोना महामारी के बढ़ने का ख़तरा अभी टला नहीं है और पक्षियों में फैलते बर्ड फ्लू के बढ़ते मामलों ने भारत सरकार को भी चिंता में डाल दिया है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्रियों के साथ ऑनलाइन इंटरेक्शन में कोरोना संकट के दौरान इस बढ़ते खतरे से उन्हें आगाह किया। उन्होंने कहा कि बर्ड फ्लू से निपटने के लिए पशु पालन मंत्रालय द्वारा कार्ययोजना बनाई गई है जिसका तत्परता से पालन आवश्यक है। उन्होंने इसमें डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट्स की भी बड़ी भूमिका बताते हुए प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी मुख्य सचिवों के माध्यम से सभी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का मार्गदर्शन करने पर ज़ोर दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि जिन राज्यों में अभी बर्ड फ्लू नहीं पहुंचा है, वहां की राज्य सरकारों को भी पूरी तरह सतर्क रहना होगा। उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि हमारे एकजुट प्रयास, हर चुनौती से देश को बाहर निकालेंगे।

भारत वही देश है जहां पक्षियों को देवी- देवताओं के वाहन के रूप में पूजा जाता है। यथा – विष्णु का वाहन गरूड़, देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू, देवी सरस्वती का वाहन हंस, कार्तिकेय का वाहन मयूर आदि हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इन पक्षियों को पूज्यनीय माना गया है।
रामकथा में पक्षियों को मनुष्यों की ही भांति अत्यंत सम्मानजनक स्थान दिया गया है। रामायण और रामचरितमानस, इन दोनों प्रमुख ग्रंथों में कौआ, गिद्ध और गरुड़ पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका का लेख है। इसके साथ ही क्रोंच, खंजन, तोता, कबूतर, कोयल आदि अनेक पक्षियों का उल्लेख स्थान-स्थान पर मिलता है।

रामचरितमानस में ऐसी ही एक कौए काकभुशुण्डि की गाथा है। कहा जाता है कि वाल्मीकि से पहले ही काकभुशुण्डि ने रामकथा गरूड़ को सुना दी थी। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार ‘अध्यात्म रामायण’ संसार की पहली रामायण है। आदि देव शिव ने सबसे पहले यह कथा देवी पार्वती को सुनाई थी। उस समय यह कथा एक कौवे ने सुनी। उसी कौवे का अगला जन्म काकभुशुण्डि के रूप में हुआ। काकभुशुण्डि को पूर्व जन्म में शिव से सुनी रामकथा संपूर्ण कण्ठस्थ थी। उन्होंने यह कथा अपने शिष्यों को सुनाई। इस प्रकार रामकथा का प्रचार हुआ। तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ का आधार भी यही ‘अध्यात्म रामायण’ है।
‘रामचरितमानस’ के उत्तरकाण्ड में तुलसीदास ने लिखा है कि काकभुशुण्डि परमज्ञानी रामभक्त हैं –
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥
राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥
अर्थात् शिवजी कहते हैं- हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्ज्वल कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी पूरी कह डाली। राम का चरित्र सौ करोड़ अपार हैं। श्रुति और शारदा भी उनका वर्णन नहीं कर सकतीं।

राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी॥
जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥
अर्थात् राम अनंत हैं, उनके गुण अनंत हैं, जन्म, कर्म और नाम भी अनंत हैं। जल की बूँदें और पृथ्वी के रजकण चाहे गिने जा सकते हों, पर रघुपति के चरित्र का वर्णन करने से नहीं चूकते।

बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी॥
उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई॥
अर्थात् यह पवित्र कथा श्रीहरि के परम पद को देने वाली है। इसके सुनने से अविचल भक्ति प्राप्त होती है। हे उमा! मैंने वह सब सुंदर कथा कही जो काकभुशुण्डि ने खगपति अर्थात् गरुड़ को सुनाई थी।

तुलसीदास आगे कहते हैं कि देवी पार्वती ने काकभुशुण्डि की चर्चा सुन कर शिव से अपना संदेह प्रकट किया कि –

हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा॥
तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभुशण्डि गरुड़ प्रति गाई॥
अर्थात् हे नाथ! आपने रामचरित्र मानस का गान किया, उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया। आपने जो यह कहा कि यह सुंदर कथा काकभुशुण्डि ने गरुड़ से कही थी।

बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह।
बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह॥
अर्थात् सो कौए का शरीर पाकर भी काकभुशुण्डि वैराग्य, ज्ञान और विज्ञान में दृढ़ हैं, उनका राम के चरणों में अत्यंत प्रेम है और उन्हें रघुपति की भक्ति भी प्राप्त है, इस बात का मुझे परम संदेह हो रहा है।
……और तब इस संदेह का निवारण करते हुए शिव ने देवी पार्वती को गरुड़ तथा काकभुशुण्डि की कथा सुनाई, जो इस प्रकार है –
लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने युद्ध के दौरान राम को नागपाश से बांध दिया था। तब देवर्षि नारद के कहने पर पक्षीराज गरूड़, जो कि सर्पभक्षी थे, ने नागपाश के समस्त नागों को प्रताड़ित कर राम को नागपाश के बंधन से छुड़ाया। स्वयं श्रीहरि के साक्षात अवतार राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर राम के परमब्रह्म होने पर गरुड़ को सन्देह हो गया। गरुड़ का सन्देह दूर करने के लिये देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्मा के पास भेजा। ब्रह्मा गरुड़ से कहा कि तुम्हारा सन्देह आदि देव शिव दूर कर सकते हैं। शिव ने भी गरुड़ को उनका सन्देह मिटाने के लिये काकभुशुण्डि के पास भेज दिया। अन्त में काकभुशुण्डि ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुना कर गरुड़ के सन्देह को दूर किया।
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा॥
उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुण्डि सुसीला।।
अर्थात् बिना प्रेम के केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्यादि के करने से रघुपति नहीं मिलते। अतएव तुम सत्संग के लिए वहाँ जाओ जहाँ उत्तर दिशा में एक सुंदर नील पर्वत है। वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डि रहते हैं।

राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना॥
राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर।।
अर्थात् वे रामभक्ति के मार्ग में परम प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणों के धाम हैं और बहुत काल के हैं। वे निरंतर राम की कथा कहते रहते हैं, जिसे भाँति-भाँति के श्रेष्ठ पक्षी आदर सहित सुनते हैं।

जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी॥
मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई।।
अर्थात् कहते हैं कि वहाँ जाकर श्रीहरि के गुण समूहों को सुनो। उनके सुनने से मोह से उत्पन्न तुम्हारा दुःख दूर हो जाएगा। शिव ने पार्वती से कहा कि – मैंने उसे जब सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणों में सिर नवाकर हर्षित होकर चला गया।

गरुड़ के सन्देह समाप्त हो जाने के पश्चात् काकभुशुण्डि ने गरुड़ को स्वयं की कथा सुनाई कि लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि को बाद में इसका पश्चाताप हुआ। तब लोमश ऋषि ने शाप से मु‍क्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौए का शरीर पाने के बाद ही राममंत्र मिलने के कारण उस शरीर से उन्हें प्रेम हो गया और वे कौए के रूप में ही रहने लगे कालांतर में काकभुशुण्डि के नाम से पहचाने गए एवं कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया।

रामकथा में गिद्धराज जटायु का उल्लेख भी मिलता है। रामायण अनुसार जटायु ऋषि ताक्षर्य कश्यप और विनीता के पुत्र थे। रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में उल्लेखित जटायु द्वारा सीता के रक्षार्थ अपने प्राणोत्सर्ग की कथा से सभी भलीभांति परिचित हैं।

आगें परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा॥
अर्थात् आगे जाने पर राम ने गिद्धपति जटायु को पड़ा देखा। वह राम के चरणों का स्मरण कर रहा था, जिनमें ध्वजा, कुलिश आदि रेखाएँ हैं।

तब कह गीध बचन धरि धीरा। सुनहु राम भंजन भव भीरा॥
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही॥
अर्थात् तब धीरज धरकर गीध ने यह वचन कहा- हे भव जन्म-मृत्यु के भय का नाश करने वाले राम! सुनिए, हे नाथ! रावण ने मेरी यह दशा की है। उसी दुष्ट ने जानकसुता को हर लिया है।

वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में वर्णित है कि सम्पाती नामक गिद्ध जटायु का बड़ा भाई था। वृत्तासुर-वध के उपरांत अत्यधिक गर्व हो जाने के कारण दोनों भाई आकाश में उड़कर सूर्य की ओर चले। उन दोनों का उद्देश्य सूर्य का विंध्याचल तक पीछा करना था। सूर्य के ताप से जटायु के पंख जलने लगे तो सम्पाती ने उसे अपने पंखों से छिपा लिया। अत: जटायु तो बच गया किंतु सम्पाती के पर जल गये और उड़ने की शक्ति समाप्त हो गयी। वह विंध्य पर्वत पर जा गिरा। जब सीता को ढूंढ़ने में असफल हनुमान, अंगद आदि उस पर्वत पर बातें कर रहे थे तब जटायु का नाम सुनकर संपाति ने सविस्तार जटायु के विषय में जानना चाहा। यह जानकर कि वह सीताहरण के समय सीता की रक्षार्थ युद्ध करते हुए रावण द्वारा मारा गया है, सम्पाती ने उन्हें बताया कि पूर्वकाल में जब पंख जलने पर वह विंध्य पर्वत पर गिरा था तब वह छ: दिन अचेत रहा, फिर वह निशाकर नाम के महामुनि की गुफा में गया। निशाकर का उन दोनों भाइयों से अपार प्रेम था। निशाकर ने सम्पाती से कहा कि वह बहुत जल गया है, भविष्य में उसके पंख और उसका सौंदर्य लौट जायेंगे किंतु अभी ठीक नहीं होगा क्योंकि बिना पंख के वहां पर्वत पर रहने से वह भविष्य में उत्पन्न होने वाले दशरथ-पुत्र राम की खोयी हुई पत्नी का मार्ग बतायेगा तथा इसी प्रकार के अनेक अन्य उपकार भी कर सकेगा। सम्पाती ने दिव्य दृष्टि से सीता को रावण की नगरी में देखा तथा वानरों का पथ-निर्देशन किया, तभी देखते-देखते उसके दो लाल पंख निकल आये।
सम्पाती के पुत्र का नाम सुपार्श्व था। पंख जल जाने के कारण सम्पाती उड़ने में असमर्थ था, अत: सुपार्श्व उसके लिए भोजन जुटाया करता था। एक शाम सुपार्श्व बिना मांस लिये अपने पिता के पास पहुंचा तो भूखे सम्पाती को बहुत ग़ुस्सा आया। उसने मांस न लाने का कारण पूछा तो सुपार्श्व ने बतलाया-‘कोई काला राक्षस सुंदरी नारी को लिये चला जा रहा था। वह स्त्री ‘हे राम, हे लक्ष्मण!’ कहकर विलाप कर रही थी। यह देखने में मैं इतना उलझ गया कि मांस लाने का ध्यान नहीं रहा।’ संपाति जटायु का भाई था। हनुमान जब सीता को ढूंढ़ने जा रहा थे तब मार्ग में गरुड़ के समान विशाल पक्षी से उनका परिचय हुआ। उसका परिचय प्राप्त कर वानरों ने जटायु की दु:खद मृत्यु का समाचार उसे दिया। उसी ने वानरों को लंकापुरी जाने के लिए उत्साहित किया था।

रामचरितमानस के किष्किंधा काण्ड में तुलसीदास कहते हैं –

सुनि खग हरष सोक जुत बानी। आवा निकट कपिन्ह भय मानी॥
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई॥
अर्थात् हर्ष और शोक से युक्त वाणी से समाचार सुनकर वह पक्षी सम्पाती वानरों के पास आया। वानर डर गए। उनको अभय वचन देकर उसने पास जाकर जटायु का वृत्तांत पूछा, तब उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनाई।

सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी॥
अर्थात् भाई जटायु की करनी सुनकर सम्पाती ने बहुत प्रकार से रघुपति की महिमा वर्णन की।

मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि।
बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि॥
अर्थात् सम्पाती ने कहा- मुझे समुद्र के किनारे ले चलो, मैं जटायु को तिलांजलि दे दूँ। इस सेवा के बदले मैं तुम्हारी वचन से सहायता करूँगा अर्थात् सीता कहाँ हैं सो बतला दूँगा, जिसे तुम खोज रहे हो उसे पा जाओगे।

रामकथा में खंजन पक्षी का भी उल्लेख है। खंजन पक्षी सुंदरवन में पाए जाते हैं। दरअसल वे पूर्वी एशिया के इलाकाें में प्रजनन करते हैं और भारत से लेकर इंडाेनेशिया तक सर्दियाें में यात्रा करते हैं। इनकी पीठ जैतूनी हरे रंग की होती है। जिस पर हल्की जामुनी रंग की आभा होती है।
रामचरित मानस के अयोध्याकाण्ड में उल्लेख है कि वनवास के समय जब ग्रामीण महिलाएं सीता से पूछती हैं कि उनके साथ वाले इन दो सुंदर युवकों में उनके पति कौन हैं?

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥
सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥
अर्थात् हे सुमुखि! कहो तो अपनी सुंदरता से करोड़ों कामदेवों को लजाने वाले ये तुम्हारे कौन हैं? उनकी ऐसी प्रेममयी सुंदर वाणी सुनकर सीता सकुचा गईं और मन ही मन मुस्कुराईं।

सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे॥
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥
अर्थात् ये जो सहज स्वभाव, सुंदर और गोरे शरीर के हैं, उनका नाम लक्ष्मण है, ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीता ने लज्जावश अपने चन्द्रमुख को आँचल से ढँककर और प्रियतम राम की ओर निहारकर भौंहें टेढ़ी करके बोलीं।

खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥
भईं मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥
अर्थात् खंजन पक्षी के से सुंदर नेत्रों को तिरछा करके सीताजी ने इशारे से उन्हें कहा कि ये मेरे पति हैं। यह जानकर गाँव की सब युवती स्त्रियाँ इस प्रकार आनंदित हुईं, मानो कंगालों ने धन की राशियाँ लूट ली हों।

रामायण में क्रौंच पक्षी का भी उल्लेख है। रामायण के रचनाकार वाल्मीकि एक दिन सुबह गंगा के पास बहने वाली तमसा नदी के एक अत्यंत निर्मल जल वाले तीर्थ पर अपने शिष्य भारद्वाज के साथ स्नान के लिए गए। वहां नदी के किनारे पेड़ पर सारस जैसा क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा अपने में मग्न था, तभी व्याध ने इस जोड़े में से नर क्रौंच को अपने बाण से मार गिराया। रोती हुई मादा क्रौंच पक्षी भयानक विलाप करने लगी। इस हृदयविदारक घटना को देखकर वाल्मीकि का हृदय इतना द्रवित हुआ कि उनके मुख से अचानक श्लोक फूट पड़ा:-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शास्वती समा।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।।
अर्थात् निषाद। तुझे कभी भी शांति न मिले, क्योंकि तूने इस क्रौंच के जोड़े में से एक की, जो काम से मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराध के ही हत्या कर डाली।

वाल्मीकि ने जब भारद्वाज से कहा कि यह जो मेरे शोकाकुल हृदय से फूट पड़ा है, उसमें चार चरण हैं, हर चरण में अक्षर बराबर संख्या में हैं और इनमें मानो तंत्र की लय गूंज रही है अत: यह श्लोक के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता।

पादबद्धोक्षरसम: तन्त्रीलयसमन्वित:।
शोकार्तस्य प्रवृत्ते मे श्लोको भवतु नान्यथा।।

इस करुणा में से कविता प्रकट हो गई थी। तब वाल्मीकि को ब्रह्मा का आशीर्वाद मिला कि तुमने प्रथम काव्य की रचना की है अतः तुम आदिकवि हो, तुम रामकथा लिखो जो धरती पर स्थित पर्वत, नदी आदि की तरह शाश्वत रहेगी।
यावत् स्थास्यन्ति गिरय: लरितश्च महीतले।
तावद्रामायणकथा सोकेषु प्रचरिष्यति।।

रामचरित मानस के अरण्य कांड में तोता, कोयल, कबूतर आदि पक्षियों का भी वर्णन मिलता है। तुलसीदास कहते हैं –

अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ॥
आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना॥
अर्थात् लक्ष्मणजी सहित प्रभु राम वहाँ गए, जहाँ गोदावरी के तट पर उनका आश्रम था। आश्रम को जानकी से रहित देखकर राम साधारण मनुष्य की भाँति व्याकुल और दीन, दुःखी हो गए।

हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता॥
लछिमन समुझाए बहु भाँति। पूछत चले लता तरु पाँती॥
अर्थात् वे विलाप करने लगे- हा, गुणों की खान जानकी! हा रूप, शील, व्रत और नियमों में पवित्र सीते! लक्ष्मण ने बहुत प्रकार से समझाया। तब राम लताओं और वृक्षों की पंक्तियों से पूछते हुए चले।

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना॥
अर्थात् हे पक्षियों! हे पशुओं! हे भौंरों की पंक्तियों! खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरों का समूह, प्रवीण कोयल तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है?
इस प्रकार सम्पूर्ण रामकथा में अनेक पक्षियों का उल्लेख मिलता है।

पक्षी युगों से हमारे जन्मजन्मांतरों के साथी हैं। मानव जाति के विकास के पूर्व से धरती पर मौजूद तथा वेदों-पुराणों से लेकर रामकथा में उल्लेखित, हमारी भारतीय संस्कृति में पूज्यनीय, और वर्तमान में जीवन संघर्ष करते अनेक पक्षियों को बर्ड फ्लू जैसे संक्रमण वाले रोगों से बचाने के लिए हमें एकजुट हो कर उसी तरह प्रयास करने होंगे जिस तरह मनुष्यों में होने वाली महामारी कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए हमने जागरूकता का परिचय दिया है।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरे कुछ दोहे –

रोग – संक्रमण से भरा, आया कैसा दौर
पक्षी बिन सूना लगे, वन, उपवन, हर ठौर

चिन्तन, सोच-विचार कर, करें इस तरह यत्न
संकट से हों मुक्त सब जग के पक्षी- रत्न

हम मानव इस हेतु यदि मिल-जुल कर हों एक
कर पाएंगे हम तभी नवयुग का अभिषेक।

सागर, मध्यप्रदेश

5 COMMENTS

  1. विचारणीय लेख। महत्वपूर्ण लेख।
    सचमुच पक्षी हमारी पृथ्वी, हमारे पर्यावरण ही नहीं वरन् हमारी संस्कृति के भी साथी हैं। हमें उनकी रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। यही अपेक्षा हमारा मनुष्यत्व भी हमसे करता है। लेखिका को साधुवाद 🙏

  2. युवा प्रवर्तक को हार्दिक धन्यवाद ऐसे लेख को प्रकाशित करने के लिए जो एक ज्वलंत मुद्दे पर पुरातन और अद्यतन मूल्यों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।

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