काव्य भाषा : नारी मरुथल को चमन करती है -डॉ ब्रजभूषण मिश्र भोपाल

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नारी मरुथल को चमन करती है

फटे कपड़ों सी उम्मीदों को सी लेती है वह
जीवन भरती निर्जीव में,और जी लेती है वह

वह काढ़ती है विविध फूल ,फल व चित्र
जीवन फटेहाल न रखती,सँवार देती है मित्र

वो मृदु हृदय,धैर्यवान,उदार सृजन क़रतीं है
नारी कलाकार होती ब्रज,मरुथल को चमन करती है

डॉ ब्रजभूषण मिश्र
भोपाल

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