लघुकथा : संक्रमण – मुनीष भाटिया , चण्डीगढ़

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संक्रमण

मां… तुम भी क्या… छींकते वक्त देखती नहीं कि पास भी कोई खड़ा है। तुम्हें मालूम होना चाहिए कि छींकने पर हजारों कोरोना वायरस के कीटाणु निकलते हैं जोकि सामने वाले व्यक्ति पर सीधे असर करते हैं। और…. तुम हो कि मुंह पर बिना कपड़ा रखे ही छींक देती हो। कितनी दफा समझाया है, लेकिन…।’
अपनी बात को अधूरा छोड़ तमतमाता हुआ ऑफिस के लिए अपना कोविड ज्ञान लिए निकल पड़ा। अपनी अनपढ़ मां को कोरोना वायरस के बारे में जानकारी दे, मैं अपने शिक्षित होने पर इतरा रहा था।
‘गुड मॉर्निंग सर।’

साहब ने छींकते भारी आवाज में मेरा अभिवादन स्वीकार किया। लगता है तबीयत नासाज़  है सर । कुछ मौसम ही ऐसा है, जितना बचाव कर लो, जुकाम हो ही जाता है। कुछ दवाई ला दूं सर।’
‘ओह नो, सब ठीक है’कहकर साहब ने जैसे केबिन से रुखसत हो जाने का इशारा कर दिया था।
उस दिन अपनी दोहरी सफलता पर मैं गदगद था क्योंकि मेरा मस्तिष्क समझदारी के वायरस से संक्रमित हो चुका था ।

मुनीष भाटिया
585,स्वस्तिक विहार,
पटियाला रोड, ज़ीरकपुर,(मोहाली),चंडीगढ़।

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