काव्य भाषा : ठंढ भी सुनती कहाँ -सुषमा दीक्षित शुक्ला लखनऊ

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ठंढ भी सुनती कहाँ

उफ़ ये कम्प लाती सर्द का,
अलग अलग मिजाज है ।

बेबस ग़रीबो के लिए तो,
बस सज़ा जैसा आज है ।

कुछ वाहहह वालों के लिए ,
तो मौज का आगाज है ।

कुछ के बदन कपड़े नही ,
कुछ के सिरों पर ताज है ।

ठंढ भी सुनती कहाँ कब,
लाचार की आवाज है ।

है खोजता कोई निवाले ,
चारों तरफ से आज है ।

गुनगुने मखमल में कोई ,
भोगता बस राज है ।

वही मौसम वही दुनिया ,
पर अलग ही अंदाज है ।

सुषमा दीक्षित शुक्ला
लखनऊ

1 COMMENT

  1. ऋतु के अनुसार अति सुंदर रचना ।
    हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँँ ।

    शिवनाथ सिंह, लखनऊ

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