लघुकथा : अपना हिस्सा – विजय कुमार,अम्बाला छावनी

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लघुकथा
अपना हिस्सा

“यार, यह सुमेश को डायबिटीज है, फिर भी अपने हिस्से का मीठा लेना नहीं छोड़ता। देख अभी भी रसगुल्ला और बर्फी के दोनों पीस उठा कर चुपचाप अपने बैग में रख लिए हैं।” विनोद की नजर सुमेश पर ही टिकी हुई थी।
“बच्चों के लिए रख रहा होगा, हमने क्या लेना”, मैंने कहा, “तू अपना खा-पी और पार्टी का मजा ले।”
“इसके कौन से छोटे-छोटे बच्चे हैं, जो एक-दो पीस में बहल जाएंगे”, विनोद कहने लगा, “देख, अब तो समोसा भी रख लिया। बड़ा कंजूस किस्म का है भई। जो खाया नहीं जाता वह तो सभी छोड़ देते हैं मेज पर ही। पर यह कभी नहीं छोड़ता। पता नहीं क्या करता है घर ले जाकर।”
“तो क्यों छोड़े भई। उसके हिस्से की चीज है, जो मर्जी हो करे”, मैंने कहा, “तेरा भी ध्यान बस इन्हीं चीजों में रहता है।”
“वह देख, वह लेकर कहीं जा रहा है सारा सामान। चल आ देखें, क्या करता है?” विनोद ने जासूसी भरे अंदाज से कहा।
“छोड़ ना यार।” मैंने टालते हुए कहा।
“चल ना यार…।” कह कर वह मुझे लगभग घसीटते हुए अपने साथ ले गया।
थोड़ी देर बाद हमने देखा कि वह खाने-पीने का सामान गेट पर खड़े दो बच्चों को पकड़ा रहा था, जो पास ही की झुग्गी-झोपड़ियों में रहते थे, और वहीं आस-पास खेलते रहते थे।
मैंने कहा, “देखा, अपने हिस्से का उपयोग इस तरह भी किया जा सकता है।”
विनोद निरुत्तर खड़ा था

विजय कुमार,
सह संपादक ‘शुभ तारिका’ प्रबंधक : ‘कहानी लेखन महाविद्यालय’
अम्बाला छावनी-133001
(हरियाणा)
मोबाइल : 9813130512

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