काव्य भाषा : अल्हङ – भुवनेश्वर मिश्रा, रायपुर (छ.ग.)

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अल्हङ

जब चल रही थी जिंदगी बडी ही सरल ,माकूल..
तुम तूफां बनके क्यों आ गए ,
इतने से भी नहीं दिल भरा तुम्हारा तो,
तुम बिना जवाब के सवाल बन के आ गए ….
दौर-ए-जवानी अभी चालू हुई है, ए चलती हुई शमशीर,
तुम काट के दिल को ,धडकने चुराने आ गए,
बडे खैर ख्वाह बने फिरते हो भुवन के तुम ,
फँसा हुआ समझ के ,शिकार बनाने आ गए….
बिफर न पङना जब पता चले मसले इस यार के ,
बडी सख्त चीज हूँ मैं ,तुम मलमल का रूमाल समझ के आ गए….
ये पुरनूर सा बदन कहीं इंतजार में अकड ना जाए,
ए हुस्न-ए-बेपरवाह तुम जलजले को झील समझ कर आ गए…
जाओ किसी और पतंगे को पकडो ,रिझाओ,
ये सलीके ,सादगी का मंदिर है तुम इसे किसी आशिक की बैठक समझ के आ गए…..।

भुवनेश्वर मिश्रा
रायपुर (छ.ग.)

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