काव्य भाषा : ग़ज़ल – प्रमिला श्री ‘तिवारी’ धनबाद

116

ग़ज़ल

उलझन मे हो जीवन तो सुलझाना पडता है ।
ढल जाने पर रूखा सूखा खाना पड़ता है ।

सुख-दुख दोनों को हीं जीवन साथी कहते हैं ।
दोनों मे हीं धीरज- संयम लाना पड़ता है ।

जीवन सुंदर उपवन सा है रहना सबको है,
इस बगिया को सींच हमें महकाना पड़ता है ।

बदली सारी रीत यहां की फिर भी जीना है,
हर पहलू पर जीवन के ढल जाना पड़ता है ।

कितनी भी मुश्किल हो साथी राहें जीवन की ,
दरिया सा कल-कल करते बह जाना पड़ता है ।

प्रमिला श्री ‘तिवारी’
धनबाद

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here