काव्य भाषा : जीवन धारा – डॉ चंचला दवे ,सागर

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जीवन धारा

कोरोना फैल कर,सिमट भी
रहा है
और ऐसे समय में
बहुत जरुरी काम जो
होने चाहिए/हो भी रहें हैं

वैक्सीन बनाये जा रहे हैं
कुछ लगाने की तैयारी
में हैं
संस्थायें खुल रहीं
रोजी रोटी के साधन
जुटाये जा रहे हैं

किसान आंदोलन/चल रहे हैं
तो कुछ अगली
फसल के लिये
खेतों को तैयार,कर रहे हैं

पारा भी खूब गिर रहा है
बर्फीली बारिश जारी है
पहाड़ों पर

यात्रायें,उड़ानें जारी हैं
कंबल बंट रहे
फोटो भी खिंच रहे
अलाव जल रहे हैं

फिर भी/असंख्य लोग
मर रहे हैं
प्रकृति का हंटर जारी है
फिर भी
नहीं रुकती
जीवन धारा

इस साल इक्के दुक्के
जा रहे,तीर्थो पर
दुबके पड़े हैं, घरों में

मैं चाहती हूं
खेत खूब उगले सोना
बारिश हो भरपूर
अन्न-जल से लबालब
हो पेट

और कोई न मरे
अब,महामारी से

डॉ चंचला दवे
सागर म प्र

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