काव्य भाषा : अश्रु क्यूँ बन रहे हैं पानी – अभय चौरे हरदा मप्र

अश्रु क्यूँ बन रहे हैं पानी

जब सालों से बिछड़े की
याद हो आती है बेमानी
छलक उठती हैं आंखें
अश्रु बन जाते हैं पानी ।।

दिल के जी होता है पास
उसकी सुरत उसमें बस जानी
भूले से भी ना भूले जो
याद होती है उतनी वो पुरानी ।।

दिल तो याद करता है पल पल
आँखे बहाती है सदा ही पानी
रग रग में वो समाहित है मेरे
बन कर रक्त जो है निशानी ।।

मैं कहूं तो किससे ए साकी
मन नही कहता अपनी कहानी
खोया रहता है यादों में उनकी
बादलों में जैसे रहता है पानी ।।

बनकर जिन्दा लाश जी रहा हुँ
बे मतलब हो गई है जिन्दगानी
ना कोई मकसद न उल्लास उसमें
जिन्दगी हो गई है अब रेगिस्तानी ।।

वो मिले तो सुकून आये जीवन में
जैसे बरसे घटा सावन का पानी
हरियाली छा जाए मेरे जीवन में
रूत आ जाए बड़ी ही मस्तानी ।।

फ़ूल खिले सदा बगिया में मेरी
खुश्बू महके हर रोज़ सुहानी
नाच उठे मन मयूरा ये मेरा
गाये कोयल वो तान मस्तानी ।।

अभय चौरे हरदा मप्र

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