‘बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा’ हास्य की महत्ता और केवट प्रसंग -डॉ. वर्षा सिंह,सागर

बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

हास्य की महत्ता और केवट प्रसंग
-डॉ. वर्षा सिंह

मेरी एक मित्र है माधुरी। पहले कभी हम एक कॉलोनी में रहते थे, साथ पढ़ते और बतियाते थे। कालांतर में हमारे जीवन की दिशाएं अलग हो गईं… मैं विद्युत विभाग की अपनी नौकरी में व्यस्त हो गई और माधुरी घर-गृहस्थी के उत्तरदायित्वों में व्यस्त हो गई। मेलजोल नहीं रहा। समयाभाव में कभी-कभार फोन पर ही हाय-हलो हो जाती है। पिछले दिनों एक ऐसी ही कुशलक्षेम जानने-बताने वाली फोनकॉल के दरमियान बातों- बातों में हम कॉलेज के दिनों के बीते पन्ने पलटने लग गए। तब हमारे एक प्रोफेसर हुआ करते थे। सी.के. उनके नाम का शार्ट फार्म था। किसी बात को ले कर उन्होंने माधुरी को भरी क्लास में अकारण डांट दिया था। जाड़ों के दिन में फ्री पीरियड में अक्सर हम पांच-छः लड़कियां क्लास रूम के सामने वाले गार्डन की फैंस के पास खड़े होकर धूप लिया करते थे। एक दिन जब हम धूप में खड़े थे तो सी.के. सर हमारे ग्रुप के पास से हो कर निकले। उधर वो निकले और इधर माधुरी ने धीरे-धीरे बड़बड़ाना शुरू कर दिया – ‘ए.के. अड़ गए, बी.के.बढ़ गए, सी.के. सड़ गए।’ हम सभी सन्नाटे में आ गए जब सी.के.सर ने मुड़ कर माधुरी की तरफ़ घूर कर देखा। माधुरी से जैसे ही उनकी नज़रें मिली माधुरी मुस्कुरा कर बोली – ‘प्रणाम, सर !’ माधुरी के इस एक्शन पर सी.के. सर एकदम भौंचक्के रह गए, वे घबरा से गए और फिर – ‘प्रणाम, प्रणाम, प्रणाम, प्रणाम’ कहते हुए तेज़ कदमों से वहां से खिसक लिए। इसके बाद हम लोग ख़ूब हंसे। बाद में भी यह घटना जब भी याद आती हम लोग अपनी हंसी रोक नहीं पाते। जी हां, पिछले दिनों माधुरी से फोन पर बात करते हुए हम वही सी.के. सर वाली घटना को याद करके ख़ूब हंसे। लेकिन मुझे आश्चर्य तब हुआ जब बात-बात पर हंसी के फौव्वारे छोड़ने वाली माधुरी ने कहा कि -‘हे भगवान, वर्षा, जानती हो कितने दिन के बाद मैं ऐसी खुल कर हंसी हूं। वरना यहां घर-परिवार के झमेलों में मैं तो खुल कर हंसना ही भूल गई थी।’
माधुरी जैसे कितने ही लोग हैं जो जीवन की समस्याओं में उलझ कर हंसी यानी हास्य से दूर होते चले जाते हैं। तनावों के लगातार झेलते रहने से उनका हास्य भाव इतना सीमित हो जाता है कि मानों वे जानते ही न हों कि हंसी भी कोई भाव है। हंसी की अहमियत तनाव के पलों की बोझिलता के समक्ष लुप्तप्राय हो जाती है।
वर्तमान समय में जीवन तनावपूर्ण हो गया है, जिसमें हास्य का लगातार कमी हो गई है। जबकि जीवन में हास्य का विशेष महत्व है। हंसना एक ऐसा टॉनिक है जो विपरीत परिस्थितियों में भी मन को हल्का और खुश रख कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। सचमुच हंसना भी एक कला है, जो मनुष्य को तनाव मुक्त रखकर जीवन स्वस्थ बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
भारतीय काव्यशास्त्र में नौ रस माने गए हैं। ये नौ रस ऐसे भाव हैं जो मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से घनिष्ठ रूप से संबद्ध होकर उसे जीवन के प्रति सम्वेदनशील बनाते हैं। “भावप्रकाश” ग्रंथ के अनुसार –
प्रीतिर्विशेष: चित्तस्य विकासो हास उच्यते।
अर्थात् हास एक प्रीतिपरक भाव है और चित्तविकास का एक रूप है।
लगातार मानसिक तनाव उपजाती जीवन की नित्य प्रति जटिल समस्याओं ने हंसी अर्थात् हास्य रस को मानो विलोपित ही कर दिया है। इसी कमी को पूरी करने के लिए एक भारतीय मनोवैज्ञानिक डॉ. मदन कटारिया द्वारा वर्ष 1998 से हास्य दिवस की शुरुआत की गई
जिसे प्रत्येक वर्ष मई माह में वर्ल्ड लाफ्टर डे अर्थात् विश्व हास्य दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। मुंबई निवासी वैश्विक हास्य योग आंदोलन के प्रणेता डॉ. कटारिया का उद्देश्य है कि दुनिया का हर मनुष्य खूब हंसे। इसका परिणाम यह है कि भारत समेत दुनिया के 108 देशों में लाफ्टर क्लब खुल चुके हैं। हंसी की ये पाठशालाएं बिना फीस के चलती हैं। लाफ्टर क्लब का मूल उद्देश्य “अच्छा स्वास्थ्य, मन की खुशी और विश्व शांति’’ में बढ़ोत्तरी करना है।’’
हंसना स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रूरी होता है।
हंसने से शरीर में ऑक्सीजन बढ़ता है। हंसने और ठहाके लगाने से शरीर में एर्डोफिन हार्मोन का उत्सर्जन होता है जो मानव तन में सक्रियता स्फूर्ति एवं प्रसन्नता को जगाता है। सिर दर्द, उच्च रक्तचाप, मधुमेह में भी इसके लाभ हैं। हंसने से खीज, चिड़चिड़ापन, टेंशन और डिप्रेशन कम हो जाता है। हंसमुख व्यक्ति किसी भी विपरीत परिस्थिति से जल्दी ही उबर कर बाहर जाता है। यह भी कहा जा सकता है कि हंसी नेचुरल पेन किलर का काम करती है। इससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है। हास्य चेहरे को खिला हुआ, ख़ूबसूरत बनाता है। यह भी कहा जा सकता है कि हंसना एक अच्छा व्यायाम है। इतना ही नहीं, हंसी से जहां एक ओर आत्मविश्वास बढ़ता है तो वहीं दूसरी ओर हंसी से सकारात्मक सोच का भी विकास होता। ऐसे कितने ही प्रमाण मिल जाएंगे कि हंसी जीवन में निराशा के भाव नहीं आने देती।
रामकथा के जगप्रसिद्ध आख्यान रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड में तुलसीदास ने जिस तरह केवट प्रसंग का उल्लेख किया है वह जीवन में हास्य की महत्ता को परिलक्षित करने वाला है। परमप्रिय पिता दशरथ की आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर, आज्ञा के पालनार्थ राजतिलक का परित्याग कर 14 वर्ष का वनवास व्यतीत करने लक्ष्मण और सीता सहित निकले राम का हृदय निश्चित ही दुखी था। राजतिलक के परित्याग से नहीं वरन् माता कैकेयी की भेदभाव वाली कलुषित दृष्टि से, पिता दशरथ और माता कौशल्या तथा सुमित्रा सहित अयोध्यावासियों की व्यथित मनोदशा से, अकारण लक्ष्मण और सीता के भी वनवास झेलने की स्थिति से राम दुखी थे। राम के दुख से पशु-पक्षी भी दुखी थे। रामवनगमन के दुख से अत्यंत बोझिल वातावरण को केवट प्रसंग ने हास्य रस के पुट से हल्का और सहज स्वीकार्य बना दिया।

वन के मार्ग में एक स्थान पर राम, लक्ष्मण, सीता को गंगा नदी पार करना था। उनके साथ उस समय निषादराज गुह भी थे जो राम की मदद के लिए साथ में थे। गंगा तट का वह प्रदेश निषादराज के राज्य क्षेत्र में था। वहां नाव द्वारा गंगा पार करने के लिए राम ने केवट को बुलाया और नाव मांगी । तुलसीदास लिखते हैं –

बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥
अर्थात् राम ने सुमंत्र को लौटाया। तब गंगाजी के किनारे पर आए।

मांगी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥

अर्थात् राम ने केवट से नाव माँगी, पर वह नाव नहीं लाया। वह कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म अर्थात् भेद जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है।
सीता स्वयंवर हेतु आयोजित धनुष यज्ञ से पूर्व राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र जब गौतम आश्रम पहुंचे थे तो वहां गौतम ऋषि के आश्रम में शिला के रूप में पड़ी शापग्रस्त अहिल्या राम के पवित्र चरण का स्पर्शमात्र पा कर शापमुक्त हो कर पुनः सुंदर मानवी के परिवर्तित हो गई थी। इसी घटना की याद दिलाते हुए केवट ने राम से कहा –
छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥
तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥
अर्थात् जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदरी स्त्री हो गई और मेरी नाव तो काठ की है। काठ पत्थर से कठोर तो होता नहीं। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री अर्थात् अहिल्या हो जाएगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जाएगी।

केवट द्वारा अहिल्या का स्मरण मर्यादित हास्य के माध्यम से करना ‘रामचरितमानस’ का महत्वपूर्ण प्रसंग है।

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥
जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥

अर्थात् मैं तो इसी नाव से सारे परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरणकमल पखारने दीजिए धो लेने के लिए कह दो।

पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।
मोहि राम राउरि आन दसरथसपथ सब साची कहौं॥
बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।
तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥

अर्थात् -हे नाथ! मैं चरण कमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा, मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजी की सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जब तक मैं पैरों को पखार न लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा।
केवट की यह बात हास्यरस की महत्ता को प्रतिपादित करने वाली है। तुलसीदास आगे लिखते हैं –

सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥

अर्थात् सुनकर करुणाधाम राम जानकी और लक्ष्मण की ओर देखकर हँसे।

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥
बेगि आनु जलपाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।।

अर्थात् कृपा के समुद्र राम केवट से मुस्कुराकर बोले भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाए। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे।

जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥

अर्थात् एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर के पार उतर जाते हैं और जिन्होंने वामनावतार में जगत को तीन पग से भी छोटा कर दिया था, दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया था, वही कृपालु राम गंगा से पार उतारने के लिए केवट का निहोरा कर रहे हैं!

पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥
केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥

अर्थात् प्रभु के इन वचनों को सुनकर गंगाजी की बुद्धि मोह से खिंच गई थी कि ये साक्षात भगवान होकर भी पार उतारने के लिए केवट का निहोरा कैसे कर रहे हैं, परन्तु समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान पदनखों को देखते ही उन्हें पहचानकर देवनदी गंगाजी हर्षित हो गईं। वे समझ गईं कि विष्णु नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया और इन चरणों का स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गईं। केवट राम की आज्ञा पाकर कठौते में भरकर जल ले आया॥

अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥

अर्थात् अत्यन्त आनंद और प्रेम में उमंगकर वह भगवान के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं है।

पसंद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥

अर्थात् चरणों को धोकर और सारे परिवार सहित स्वयं उस जल चरणोदक को पीकर पहले उस महान पुण्य के द्वारा अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनंदपूर्वक राम को गंगा के पार ले गया।

यह वही केवट है जिसके पूर्व जन्म की कथा पौराणिक ग्रंथों में कुछ इस प्रकार मिलती है कि सतयुग में गंगासागर में एक कछुआ निवास करता था। वह बहुत धार्मिक प्रवृत्ति का था। एक बार गंगासागर में स्नान करने आए कुछ ऋषियों के मुख से उसने श्रीहरि के चरणों की महिमा सुनी। जिसे सुन कर कछुए के मन में श्रीहरि विष्णु के चरणों के दर्शन की लालसा जागृत हो गई। ऋषियों के सुझाव पर कछुए ने पूरी निष्ठा से विष्णु की आराधना शुरू कर दी। जब बहुत दिन बीत गए और उसकी आराधना का कोई परिणाम दृष्टिगोचर नहीं हुआ तो ऋषियों के पुनरागमन पर ऋषियों के ही सुझाव पर वह श्रीहरि के धाम क्षीरसागर के लिए चल पड़ा जहां विष्णु शेषनाग की शय्या पर विराजित थे। मार्ग में अनेक बाधाएं सहता कछुआ अंततः क्षीरसागर पहुंच ही गया। किन्तु वहां शेषनाग की शैया पर निद्रावस्था में स्थित विष्णु के चरण लक्ष्मी दबा रही थीं। अतः शेषनाग और लक्ष्मी ने कछुए को दूर भगा दिया और जिसके कारण, विष्णु के चरण-स्पर्श के प्रयास में कछुए को सफलता नहीं मिल पाई। वह बहुत निराश हो गया। तथापि उसकी वर्षों की आराधना, उसकी क्षीरसागर की कठिन यात्रा को विफल होता देख विष्णु मन ही मन मुस्कुराए और उन्होंने अपने राम अवतार में कछुए को केवट के रूप में जन्म लेने का वरदान दे दिया। त्रेतायुग में विष्णु ने जब राम का अवतार लिया तो शेषनाग अवतार लक्ष्मण और लक्ष्मी अवतार सीता के समक्ष ही केवट ने राम रूपी विष्णु के चरण-स्पर्श के साथ ही चरण धोने, पखारने की लालसा पूर्ण कर ली।

बचपन में पढ़ी थी श्रीनाथ सिंह का एक बालगीत… शायद आपने भी पढ़ी हो…
फूलों से नित हँसना सीखो,
भौंरों से नित गाना।
तरु की झुकी डालियों से ,
नित सीखो शीश झुकाना ।

खिले हुए फूल की तरह हंसते हुए जीवन निर्वाह करना सचमुच बहुत बड़ी चुनौती है जिसे हमें स्वीकारना होगा। जीवन में समस्याओं का तो कोई अंत नहीं है। कुछ न कुछ परेशानियां सभी के साथ लगी रहती हैं। लेकिन यदि हम इन परेशानियों से, समस्याओं से घिरे रहने के बावज़ूद हंसने-हंसाने के तनिक-से भी अवसर निकाल लें तो ज़िन्दगी आसान हो जाएगी। एकरसता वाली दिनचर्या में ऐसे अल्पविराम ज़िन्दगी की समस्याओं से दो-चार होने के लिए हमें नई ऊर्जा देते हैं।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरे कुछ दोहे –

बेशक इतना जान लें, क्षणभंगुर संसार ।
हंसी-ख़ुशी से ही मने,सांसों का त्यौहार ।।

रोना-धोना रोज़ है, दुख हैं कई हज़ार ।
हंसने का अवसर मिले, सहज करें स्वीकार ।।

छोटी-छोटी सी ख़ुशी, मिल कर बने अपार ।
ज्यों बूंदें मिल कर बने “वर्षा” की बौछार ।।

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सागर, मध्यप्रदेश

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