काव्य भाषा : दिल्ल्गी – प्रकाश रंजन ‘शैल’ पटना

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दिल्ल्गी

क्यूं सुनें और क्या बताएं
रोज की जद्दोजहद यह
दिल्लगी के रस्म हैं क्या
टूट कर फिर मुस्कुराना
क्या जरूरत है तुम्हें यूं
आईना मुझको दिखाना
डूबी देखो दिल की कस्ती
ख्वाबों के दरिया किनारे
बेसबब बिखड़े पड़े हैं
नींद से बोझिल सितारे
मै दीवाना चांद को
दिल मे छुपाए घूमता हूं
चांद हंसता आसमां मे
देख कर मुझको अकेला।।

प्रकाश रंजन ‘शैल’
पटना

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