काव्य भाषा : मन के हारे-हार है मन के जीते जीत -चंद्रकांत खुंटे “क्रांति” जांजगीर-चाम्पा

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मन के हारे हार है मन के जीते जीत

मन के हारे हार,मन के जीते जीत।
चल रे मनवा! धीरे-धीरे,पल न जाये बीत।
गिरा स्वेद,करके परिश्रम,मंजिल को बनाके मीत
चाह यही है,राह यही है,यही है जीवन के गीत।
मन के हारे हार..मन के जीते जीत।।

मंजिल अब तो दूर नही,चलना है कुछ देर।
दुविधा मन में आ गयी,हो जाऊँ न कही ढेर।
डूबता-उतरता हूँ पल-पल,मनका मेरा फेर।
शूल मिलेंगे,धूल मिलेंगे,बबूल हो चाहे बेर।
फिर भी हौंसला रख,आगे बढ़,होगा निज हित।
मन के हारे-हार है, मन के जीते- जीत।।

उतर गए हो रण में तो,पीछे काहे देखते हो?
सफल होगे कि निष्फल,यह क्यो परखते हो?
नतमस्तक कर शैल श्रृंग,गिरा स्वेद निज हाथ।
काया-क्लेश मुक्त कर,बलिष्ट बना के माथ।
चढ़ कर गिरना,गिर कर चढ़ना,यही है जीवन रीत।
चल रे मनवा! धीरे-धीरे,उमर न जाये बीत।
मन के हारे-हार है मन के जीते-जीत।।

रण के अंतिम दौर में,भविष्य के अंतिम ठौर में।
हिम्मत दिखा,साहस जगा,एकाग्र कर।
चल-चल साध निशाना बन के तीर।
स्वप्न यही है,लक्ष्य यही है,यही है जीवन का प्रीत।
चल रे मनवा! धीरे-धीरे,बनाकर तुम रीत।
मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।।

✍?चंद्रकांत खुंटे “क्रांति”
जांजगीर-चाम्पा (छग)

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