काव्य भाषा : तभी दिवाली है -डॉ ब्रजभूषण मिश्र भोपाल

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तभी दिवाली है

मिटे मार्ग के तम
हों समाप्त सब गम
तभी दीवाली है

रहे न कोई रुष्ट
नष्ट सभी हों दुष्ट
तभी दिवाली है

चेहरा होवे जगमग
बाधा न होवे पग
तभी दिवाली है

मित्र न हों जाली
रहे अन्न भरी थाली
तभी दिवाली है

मांगे न कोई भिक्षा
दे रोजगार हर शिक्षा
तभी दीवाली है

करें साफ,रंगें घर द्वार
सद्गुण का करें श्रृंगार
तभी दिवाली है

दीपक,बाती ज्योति
जीवन में भरे प्रकाश
तभी दिवाली है

खुशबू सा महके तन
हो फूलों सा सुन्दर मन
तभी दिवाली है

हो शान्त सरल आचार
और मीठा सा व्यवहार
तभी दिवाली है

सुख,हंसी ठहाके हों
बस यही पटाखें हो
तभी दिवाली है

हों लुप्त सभी ठग चोर
और अपराध मुक्त हर ठौर
तभी दिवाली है

स्पष्ट रहें सब लक्ष्य
कर सकें प्राप्त,हो दक्ष
तभी दीवाली है

जब प्रकृति लगे न्यारी
और मां की ममता प्यारी
तभी दिवाली है

हो प्रेम सिक्त जीवन
मन में ना हो भटकन
तभी दिवाली है

सोने सा चमके मन
चांदी सा दमके तन
तभी दिवाली है

बड़ों का आदर व सत्कार
रखें जन सदा परस्पर प्यार
तभी दिवाली है

डॉ ब्रजभूषण मिश्र
भोपाल