काव्य भाषा : गज गामिनी -सुषमा दीक्षित शुक्ला लखनऊ

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गज गामिनी

गज गामिनि वह दर्प दामिनी ,
कल कल करती सरिता ।
निर्झरिणी सी झर झर झरती ,
ज्यों कविवर की कविता ।

कोमल किसलय कुमकुम जैसी ,
कनक कामिनी वनिता ।
कोकिल कंठी कमल आननी,
ज्यों प्रभात की सविता ।

मृगनयनी वह मधुर भाषिणी ,
पुष्पगुच्छ की लतिका ।
कुंचित केश राशि सिर शोभित,
ज्यों कृष्ण नाग की मनिका

© सुषमा दीक्षित शुक्ला
लखनऊ

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