विविध : सम्बंधो के बदलते संस्कार मोबाइल ,मीडिया और हम – सुरेखा अग्रवाल स्वरा लखनऊ

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सम्बंधो के बदलते संस्कार
मोबाइल ,मीडिया और हम

यह तीन चीज़े आज हावी है हम सब पर। इसमे जरा सी भी अतिश्योक्ति नही है। आज सारे रिश्ते इसी में सिमट कर रह गए हैं। एक घर मे चाहे दस लोग हो चाहे दो।सन्नाटे का अधिपत्य आपको मिलेगा। वजह मोबाइल औऱ मीडिया।
छत सुनसान पार्क बेजान, घर मे बच्चे गेम्स में व्यस्त ।
फुर्सत मिली भी तो सीधे मोबाइल में। हालचाल घर मे नही पूछता कोई। मोबाइल पर हद से ज्यादा अपनापन। बेशक घर मे जीवंत रिश्तो का कोई मोल नही।
सचमुच रिश्तो के संस्कार बदल गए हैं। मैं तुम हम आप सिर्फ मोबाइल मीडिया के होकर रह गए हैं। न जाने क्यों हम इसकी गिरफ्त में आ गए है। यह जानते हुए भी की यह गलत है ।
फिर भी हम अपनी दुनियाँ को इस छोटे से यंत्र में समेटे हुए हैं।
एकांत औऱ अकेलापन बेशक अपनी परिभाषा खो चुका है।
शोर शांत है और खामोशी मोबाइल और मीडिया में अपना वजूद ढूंढ रही है । समूचा विश्व औऱ लोग अस्तित्व को खोजने इसी तरफ बढ़ रहे। अपनो की सलाह “गूगल बाबा” ने ले ली दादी नानी को कैद कर ख़ुद बुजुर्ग हो चला मीडिया बच्चों को अपने चुंगल में ले चुका।
इश्क ,नफरत,दंगे हड़ताल सब ऑनलाइन,मंदिर के दर्शन तीज़ त्योहार जन्मदिन दाह संस्कार सब ऑनलाइन ।
हम ऑनलाइन आप ऑनलाइन सब ऑनलाइन होकर ज़िन्दगी को ऑफ़ लाइन कर रहे हैं।
ऐसे में सिर्फ एक गीत कि पँक्तियाँ याद आ रही। जो इस आलेख को सम्पूर्ण कर देती है

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाईयों का शिकार आदमी..!!

सचमुच सम्बंधो के संस्कार बदल गए है…!
क्या आपको भी ऐसा लगता है ?
इस सबसे बड़े विश्वास पात्र औऱ करीबी दावानल पर क्या हम जीत हासिल कर पाएँगे एक बड़ा प्रश्न है?
अगर जीतेंगे तो कैसे?
औऱ हारेंगे तो इसकी गुलामी हमारा क्या हश्र करेगी?
कई सवाल औऱ जवाब एक – सिर्फ “हम..”।

सुरेखा अग्रवाल स्वरा
लखनऊ

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