काव्य भाषा : अगले बरस मोहे बिटिया ना कीजो – शिखा नागर ,गाजियाबाद

325

Email

अगले बरस मोहे बिटिया ना कीजो…

हो तुम परमपिता परमेश्वर,
सृष्टि के तुम पालनहार,
अद्भुत रंगों से रंगा है तुमने ये सुंदर संसार…
पर हे ईश्वर !
क्यों रंग डाला तुमने एक ही जीवन में सौ बार जन्म मरण बिटिया का जीवन?

मां के शीतल आंचल में जब पुलकित किया नवजीवन,
डोर बन वनमाली पिता ने लहू से अपने सींचा…
मान मनुहार, लाड़-प्यार कर लुटाया मुझपे अपना स्नेह अपार,
संस्कारों की दी धरोहर..
बनाया अपनी आन बान और शान ।
संसार की रीत निभाने को किया फिर कन्यादान…
हो गई पराई अपने ही घर में,
छुटा मुझसे मेरा स्वप्निल संसार।

छोड़ सारे मोह के बंधन सजाया फिर से मैंने अपना घर-बार।
कदम कदम पर हुई परीक्षा,
पर झुकने ना दिया पिता का मान-सम्मान…

सर्वस्व लुटाया,
दायित्व निभाया,
फिर भी ना मिला मुझे,
वो सत्कार ना वो अधिकार।
अपनों में ही रही.. होकर मैं पराई,
बना ना पाई अपना कोई मकाम।

तुम ही बताओ…
हे परमेश्वर!
क्यो दिये तुमने मुझे दो दो घर,
जब हूं मैं पराई दोनों ही घर।
नहीं चाहती मैं ऐसा जीवन रहूं अपनों में बनके मैं बेगानी।
गर है विधान,ऐसा ही बिटिया का जीवन…
तो करती हूॅं हाथ जोड़ प्रार्थना मैं तुमसे..
सब दु:ख दिजो पर अगले बरस मोहे बिटिया ना किजो ।

शिखा नागर
गाजियाबाद

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here