काव्यभाषा : हैं दिन व रात गिने सबके – डॉ ब्रजभूषण मिश्र भोपाल

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हैं दिन व रात गिने सबके

धन,वैभव,सुख,सुविधा
हैं जीवन के सत्य नहीं
सुखदायी स्मृति के क्षण
अर्जन तेरा है मात्र वही

सखा, मित्र ,सम्बन्ध भी
रह जावेंगे धरे यहीं
बस तूँ और स्वस्थ मन
जावेगा तेरे साथ कहीं

ना ही है ये तन तेरा
ना ही कुछ अर्जन तेरा
हैं दिन व रात गिने सबके
ब्रज,गिनी साँझ व सबेरा

डॉ ब्रजभूषण मिश्र
भोपाल