काव्यभाषा : जय-जय जवान जय-जय किसान – चन्द्रकांत खुंटे जांजगीर चाम्पा

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जय-जय जवान जय-जय किसान

जय-जय जवान,जय-जय किसान
जग-जग बगरा,अपना निशान।
मैदान हो चाहे रेगिस्तान।
तू रहना हमेशा सावधान।
अवरोधों का करदे निदान।
जग में बना,अलग पहचान।
तुझको बनना है महान।
निज स्वत्व के लिये हो जा बलिदान।
तुझ पर टिका हिंदुस्तान।
जय-जय जवान जय-जय किसान।

सुन-सुन जवान,बनके तूफ़ान।
सुरक्षा कर , बनके दरबान।
चढ़-चढ़ चट्टान,भरके उड़ान।
चढ़ना है तुझको,प्रत्येक सोपान।
बन-बन बलवान,बनके सुजान।
निज राष्ट्र का , थाम ले कमान।
स्वच्छ रख,अपना ईमान।
करम करके,बना पहचान।
देश राष्ट्र का, कर उत्थान।
निज पथ बना,चलके निशान।
कंधो पे उठा ,निज हिंदुस्तान।
जय जय जवान,जय जय किसान।

जय-जय किसान,भूमि के मितान।
पोषण करता,विश्व जहान।
तुम उप जाते ,गेहूँ – धान।
करते दुनिया का उत्थान।
अ र त-त तुम्हारी जुबान।
सारी दुनिया इस पर कुर्बान।
बैल- भैंस , तुम्हारे वाहन।
धरती पर,करते हो शासन।
तेरा मन है निश्छल-पावन।
परिश्रम करते ठंडी-सावन।
हरा भरा , धरती – उपवन।
यथार्थ के तुम हो भगवन।
भरण-पोषण तुम्हारा मिशन।
इसलिये करता हूँ वन्दन।
जय-जय जवान,जय-जय किसान।

जय-जय किसान,भूमि के मितान।
धरा के श्रेष्ठ , तुम बलवान।
परिश्रम के तुम खदान।
हल-तुतारी तुम्हारा निशान।
धोती – पगड़ी , है परिधान।
क्यों होते हो तुम परेशान?
सबसे ऊँचा तुम्हारा स्थान।
तुझसे दुनिया को गुमान।
हवा-बारिश लेता इम्तिहान।
डरते नही वर्षा – तूफ़ान।
तुम्हारी जान खेत-खलिहान।
तुम ही धरा के ,वेद- कुरान।
तुम ही देव , तू ही रहमान।
तुम हो धरती के वरदान।
जय-जय जवान,जय-जय किसान।

चन्द्रकांत खुंटे