अंग्रेजी प्रेमी,पीढ़ी के सम्मुख हिंदी बोलने में गर्व का अनुभव करें – कुमकुम गुप्त

“हमारी विरासत और हिन्दी भाषा” पर केन्द्रित वेबिनार सम्पन्न:
अंग्रेजी प्रेमी,पीढ़ी के सम्मुख हिंदी बोलने में गर्व का अनुभव करें : कुमकुम गुप्त

भारतीय शिक्षण मंडल, महिला प्रकल्प- महाकौशल प्रांत सागर म प्र का हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार “हमारी विरासत और हिन्दी भाषा” संरक्षक- -सुश्री अरुंधती कावड़कर अखिल भारतीय शिक्षण मंडल महिला सह प्रमुख एवं डॉ संजीव जैन प्रांताध्यक्ष महाकौशल प्रांत के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डा सरोज गुप्ता ने बताया कि वाक् संस्कृति की परम्परा संस्कृत से- शब्द ब्रह्म तथा भाषा ब्राह्मी देवनागरी लिपि के माध्यम से हिन्दी में आयी। जहां भाषा केवल विचार विनिमय का साधन नहीं है वरन् संस्कार सूचक है। भारतीय शिक्षण मंडल का ध्येय मंत्र का वाचन श्रीमती क्लीम राय ने ,सरस्वती वन्दना-श्रीमती शशि दीक्षित तथा भारतीय शिक्षण मंडल का ध्येय वाक्य-श्रीमती शोभा सराफ ने प्रस्तुत किया।अतिथियों का शाब्दिक स्वागत भाषण श्री संजय पाठक,सह प्रांत मंत्री द्वारा व्यक्त किया गया।डॉ ऊषा मिश्रा, डॉ संगीता सुहाने, श्रीमती राजश्री दवे, श्रीमती शोभा सराफ , डॉ क्लीम राय ने अतिथियों का परिचय प्रस्तुत किया। ऋषिकल्पआचार्य पं दुर्गाचरण शुक्ल जी ने ऋषि विश्वामित्र के पुत्र वाजश्रवा का श्लोक सुनाते हुए सरस्वती को सरस-वती, रसयुक्त अन्तरिक्ष की देवी बताया तथा कामना की मां पृथ्वी पर उतरकर विद्वतजनों को ज्ञान प्रदान करे , सरस्वती ज्ञान रुपी समुद्र हैं, हमसबको अनन्त ऐश्वर्य प्रदान करे, चेतनता प्रदान करे- इसप्रकार आशीर्वाद दिया। कार्यक्रम की अध्यक्ष – डॉ विनय कपूर मेहरा, कुलपति श्री भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय सोनीपत हरियाणा ने कहा कि भाषा समाज व राष्ट्र की पहचान होती है।उसकी अस्मिता, सांस्कृतिक वैभव ,बौद्धिक उत्कर्ष की द्योतक होती है। आपने हिंदी को जमीन से जोड़ने की बात कही। बीज वक्ता डॉ गिरीश्वर मिश्र जी पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा ने भारतीय संस्कृति, इतिहास, तथा ज्ञान की दीर्घकालीन परम्परा को बताते हुए आज हिन्दी की दशा व दिशा पर विचार व्यक्त किए। ज्ञान की दीर्घकालीन परम्परा हमारे पास है परन्तु हमें ज्ञान नहीं है। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि वरिष्ठ कथाकार डॉ रजनी गुप्त ने कहा कि आज के इस दौर में जहां पूंजीवाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बोलबाला है, ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में हमें अपनी जमीन, जड़ों और अस्मिता की रक्षा हेतु अपनी भाषा की तरफ विशेष ध्यान देने की जरूरत है ताकि अपनी देसी संस्कृति और सभ्यता और जीवन मूल्यों को संरक्षित कर सकें।भाषा सबसे सशक्त माध्यम है जिससे हम अपनी जीवन शैली में भारतीयता को संरक्षित कर सकते हैं। सारस्वत वक्ता- डॉ उमा वाजपेयी, उज्जैन ने कहा कि भाषा हमें परम्परा से विरासत के रूप में प्राप्त होती है,उसे पूँजी की तरह सहेजना हम सबका दायित्व है।भाषा की प्रकृति बहती नदी की धारा के समान है,वह सतत् प्रवाहमान है,इसलिये वह शुद्ध,निर्मल ,पावन होती चलती है,साथही कूल-किनारों के असर के कारण रंग-रूप भी बदलती है और फिर परिष्कृत भी होजाती है।इसलिये बहुत चिंतित होने के स्थान पर उसके लिए सजग रहने की ज़रूरत है।।लेखिका संघ म प्र भोपाल की सचिव डा कुमकुम गुप्ता ने कहा कि अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए रोमन लिपि में हिंदी लिखने का विरोधी स्वर उठायें, स्वयं और अपने बच्चों को देवनागरी लिपि में लिखने की आदत का विकास करें l सदा हस्ताक्षर हिंदी में करें और अंग्रेजी प्रेमी पीढ़ी के सम्मुख हिंदी बोलने में गर्व का अनुभव करें l गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार की प्रोफेसर डॉ निशा शर्मा ने कहा कि हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति जिस उत्तर दायित्व का निर्वहन वर्तमान समय के लेखक -रचनाकार प्रकाशक व पाठक कर रहे हैं उसकी अनुभूति सुखद है । “साहित्य आजतक”, “हिंदी हैं हम”आदि मुहिम चलाने वाली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया हिंदी का प्रचार-प्रसार ही नहीं बल्कि जन भावनाओं को प्रकट करने का सशक्त माध्यम सदैव से रही । हिंदी में रोजगार की संभावनाएं बढ़ रही हैं, हिंदी भाषा के अपने विशिष्ट प्रौद्योगिकी क्षेत्र हैं जिनसे लोगों की जिजीविषा जुड़ी हुई है। हिंदी को सशक्त बनाने का उत्तरदायित्व हम सबका है जो अपने देश से प्रेम करता है वह अपनी भाषा से भी प्रेम करता है। हिंदी प्रेम और आत्मविश्वास की भाषा है।
आभार रीवा विभाग प्रमुख डॉ मेजर विभा श्रीवास्तव ने व्यक्त किया तत्पश्चात् कल्याणमंत्र तथा शान्ति मंत्र का वाचन श्रीमती क्लीं रॉय ने किया। तकनीकी सहयोगी समन्वयक के रूप में श्री सोनक नामदेव एवं श्री अनुराग वृजपुरिया रहे। समापन अवसर पर श्री संजय पाठक ने सबके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए हिन्दीमय वातावरण हेतु जन-जन से आह्वान किया।

सागर से डॉ चंचला दवे द्वारा