” बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा ” पितृपक्ष, रेणू और उऋण का चिंतन -डॉ. वर्षा सिंह सागर

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

पितृपक्ष, रेणू और उऋण का चिंतन

-डॉ. वर्षा सिंह

हमारी भारतीय परंपरा में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का पर्व पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष के नाम से जाना जाता है। इसे विभिन्न क्षेत्रों में ‘सोलह श्राद्ध’, ‘महालय पक्ष’, ‘अपर पक्ष’ आदि कहते हैं। प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष का आरम्भ भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से होता है। जो कि क्वांर अर्थात् आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त हो जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 2 सितंबर से आरम्भ हो चुका है एवं कल 17 सितंबर, गुरुवार तक रहेगा। हिंदू धर्म में पितृपक्ष के इन 15-16 दिनों को बहुत पवित्र और शुभ माना जाता है।

इस पक्ष में हम अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। श्राद्ध कर्म का अर्थ है पूर्वजों यानी पितरों की प्रसन्नता हेतु श्रद्धा से किया जानेवाला कार्य। हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह माना जाता है कि श्राद्ध पक्ष में चन्द्रलोक से उतर कर हमारे पूर्वज धरती अर्थात् मृत्यु लोक पर आते हैं। इसलिए “अतिथि देवो भव” का निर्वहन करते हुए हम उनका आदर, सत्कार करते हैं, जिसके अंतर्गत श्राद्ध कर्म किए जाते हैं ताकि पूर्वजों अर्थात् पितरों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो सके और उनके द्वारा हमें सुखी जीवन का आशीर्वाद प्राप्त हो सके। हमारे धार्मिक शास्त्रों में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण बताए गए हैं। पूर्वजों का ऋण उतारने के लिए पितृ पक्ष में श्राद्ध हेतु विधि- विधान से पूजन कर पूर्वजों को जल अर्पण किया जाता है।

पूर्वज का शाब्दिक अर्थ है – जो पहले उत्पन्न हुआ हो, अर्थात् जन्मा हो। अब प्रश्न उठता है कि पूर्वज की परिभाषा क्या है ? प्रचलित अर्थों में पिता, माता से पूर्व जन्में दादा, परदादा, दादी, परदादी सहित उनसे भी पूर्व जन्म लेने वाले कुटुम्बी आदि स्त्री- पुरुष पूर्वज कहलाते हैं। धर्मग्रंथों के अनुसार वे दिव्य पितृगण पूर्वज कहलाते हैं, जिनका निवास चन्द्रलोक है। यदि गहराई से विचार किया जाए तो वसुधैव कुटुम्बकम् सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है, जो महा उपनिषद सहित कई ग्रन्थों में लिपिबद्ध है। यह पूरा श्लोक इस प्रकार है –
अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।
अर्थात् यह मेरा है, वह उसका है, ऐसी सोच संकुचित चित्त वाले व्यक्तियों की होती है। इसके विपरीत उदारचरित वाले लोगों के लिए तो यह सम्पूर्ण धरती ही एक परिवार जैसी होती है। तब इस दृष्टि से पूर्वजों में भी भला अपने – पराए कैसे ! ‘हमारे पूर्वज’ का वृहत अर्थ वे सभी व्यक्ति हैं जिन्होंने इस धरती पर हमसे पहले जन्म लिया है। तो इस विचार से साहित्य से, लेखक अथवा पाठक, किसी भी रूप से जुड़े प्रत्येक उस व्यक्ति का हम पर ऋण है जो हमसे पूर्व जन्मा है और साहित्य सृजन करता रहा है। हां, और हम साहित्यप्रेमी, सृजनधर्मी इसीलिए पूर्वज कवियों, लेखकों, साहित्यकारों और उनके रचना संसार के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के उद्देश्य से उनका जन्मदिन, पुण्यतिथि, जन्मशताब्दी आदि मनाते हैं।
साहित्यकारों को धन्यवाद ज्ञापित करने, उनका स्मरण करने अथवा उनके रचना संसार में प्रविष्ट होने के लिए किसी पक्ष विशेष, अनुष्ठान विशेष या श्राद्ध-तर्पण इत्यादि की आवश्यकता नहीं होती। जब हम किसी साहित्यकार की कृति का वाचन करते हैं, उस पर मनन चिंतन करते हैं तो हमारा वह कृत्य ही हमारे द्वारा उस साहित्यकार के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना होता है। कोई भी साहित्यकार अपने विचारों के माध्यम से पुस्तकरूपी चन्द्र लोक में निवास करता है। वह पुस्तक ही उसका चंद्रलोक होती है जिससे उतरते हुए वे हमारे मन मस्तिष्क में छा जाते हैं। साहित्यकार का व्यक्तिगत जीवन कैसा भी क्यों न रहा हो लेकिन यदि उसका साहित्य समाज के प्रति अपनी तनिक भी उपादेयता रखता है तो उसका साहित्य अविस्मरणीय बन जाता है। हम साहित्यकारों, कवियों, लेखकों को उनकी कृतियों के माध्यम से सदैव स्मरण कर सकते हैं। हम उस साहित्य का भी स्मरण करते हैं जिनके रचनाकार का नाम हमें ज्ञात नहीं होता या वह साहित्य जो अज्ञात द्वारा रचा गया होता है। ऐसे पूर्वज साहित्यकारों का स्मरण किसी पितृपक्ष तक सीमित नहीं रहता है। जन्मदिन, जन्मशताब्दी, पुण्यतिथि, रचना वर्ष, रचना काल इत्यादि मना कर हम किसी साहित्यकार विशेष के प्रति उनका पुण्य स्मरण करते हुए अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते रहते हैं।
इस वर्ष हम हिंदी साहित्य प्रेमी फणीश्वरनाथ रेणु की जन्म शताब्दी बना रहे हैं। जी हां, वही फणीश्वरनाथ रेणु, जिनकी प्रसिद्ध कहानी “मारे गए ग़ुलफ़ाम” पर आधारित 1966 में बनी फ़िल्म तीसरी कसम की शूटिंग सागर, मध्यप्रदेश की बीना तहसील सहित खिमलासा आदि ग्रामीण इलाकों में हुई थी। इस फ़िल्म का निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने और निर्माण प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने किया था। निपट देहात की पगडंडियों पर बैलगाड़ी चलाते हुए गायक मुकेश के प्लेबैक से अभिनेता राज कपूर ने नायक हीरामन का ‘सजन रे झूठ मत बोलो’, ‘सजनवा बैरी हो गए हमार’ और ‘दुनिया बनाने वाले क्‍या तेरे मन में समाई’ गीतों पर हृदयग्राही अभिनय किया। यूं तो ‘लाली-लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया’ उत्तर बिहार का लोकगीत है किन्तु इसका फिल्मांकन कच्चे मकानों वाले सागर के ग्रामीण परिवेश का आईना है। वहीदा रहमान ने नायिका हीराबाई की भूमिका निभाई थी। सागर के पूर्व कवि राजनेता स्व. विट्ठलभाई पटेल ने भी इस फ़िल्म के निर्माण में अपना योगदान दिया था।

तीसरी क़सम का नायक हीरामन एक गांव का गाड़ीवान है। एक दिन उसकी बैलगाड़ी में नौटंकी कंपनी में काम करने वाली हीराबाई बैठती है। हीरामन बातूनी है जो हीराबाई से बातें करता हुआ उसे नौटंकी के आयोजन स्थल तक उसे पहुँचा देता है। इस बीच हीरामन को अपने पुराने दिन याद आते हैं कि हीरामन एक बार चोरबाज़ारीर का सामान अपनी बैलगाड़ी में ले जाने के कारण संकट में पड़ जाता है। इसके बाद वह पहली कसम खाता है कि अब वह “चोरबजारी” का सामान अपनी गाड़ी में कभी नहीं लादेगा। उसके बाद एक बार बोरे की लदनी से परेशान होकर उसने दूसरी क़सम खाई कि चाहे कुछ भी हो जाए वो बोरे की लदनी अपनी गाड़ी पर नहीं लादेगा। बाद में नौटंकी की नर्तकी हीराबाई से प्रेम हो जाने और इस प्रेम में अनेक उतार-चढ़ावों वाली विषम परिस्थितियों के बाद अन्त में हीराबाई के गांव से चले जाने से उदास हो कर हीरामन ने तीसरी क़सम खाई कि वह अब अपनी बैलगाड़ी में कभी किसी नाचने वाली को नहीं बैठालेगा। हीराबाई और हीरामन की इस प्रेम कथा में ये पात्र देवदास की तरह प्रेम में मृत्यु को अंगीकार नहीं करते बल्कि अलग-अलग रहते हुए प्रेम को हृदय में जीवित रखते हैं। तीसरी क़सम फ़िल्म ने रेणू की साहित्यिक कृति को ग़ैर साहित्यिक व्यक्तियों के बीच भी लोकप्रिय बना दिया।
फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 04 मार्च 1921 को बिहार के अररिया जिले में फॉरबिसगंज के पास औराही हिंगना गाँव में हुआ था। उन्होंने अपने लेखन सामाजिक यथार्थवादी से प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाया। उनकी साहित्यिक कृतियों में मैला आंचल, परती परिकथा, पलटू बाबू रोड उपन्यास हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। लाल पान की बेग़म, संवदिया, मारे गए ग़ुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी क़सम, ठेस, रसप्रिया बार- बार पढ़ी जाने वाली कहानियां हैं। फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का आंचलिकता और सामाजिक परिवेश से गहरा तथा अंतरंग रिश्ता था। उन्होंने अपनी रचनाओं में बिहार की लोक कथाओं और लोकगीतों का भरपूर उपयोग किया है। एक सदी बीत जाने के बाद भी हम उन्हें उसी तरह याद करते हैं, जैसे अपने किसी आत्मीय कुटुम्बी को। हां, साहित्य जगत अद्भुत है, इसके बृहत्तर कुटुम्ब में पूरी पृथ्वी है, बल्कि पृथ्वी से परे सूर्य लोक, चन्द्र लोक, नक्षत्रादि भी, जहां फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ मात्र बिहार के नहीं रह जाते हैं, और तीसरी क़सम बुंदेलखंड में भी चरितार्थ होती दिखती है। यही तो पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का अर्ध्य है। भौगोलिक सीमाओं को मिटाते हुए जहां हम अपने से पूर्व हुए व्यक्ति के प्रति अपना ऋण अनुभव करते हैं और प्रति वर्ष उसे चुकाने का प्रयास करते हैं। यही निरंतरता ही हमारी सांस्कृतिक जीवंतता है।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरे दोहे –

क्या जीवन, क्या मृत्यु है, क्या शीतल, क्या दाह ।
पूजनीय वे पूर्वज, दिखा गए जो राह ।।

ऋण चुकता करना नहीं, संभव पड़ता जान।
‘वर्षा’ हम करते सदा, पितरों को सम्मान।।
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सागर, मध्यप्रदेश