काव्यभाषा : कुछ अच्छा नहीं लगता -आर एस माथुर इंदौर

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कुछ अच्छा नहीं लगता

मनाया जाना वृद्ध दिवस
जुड़ जाता है अपना भी नाम
और नजर आने लगता है
लोगों की नजरों में हल्का सा तरस थोड़ी सी इज्जत थोड़ा उपालंभ और ढेर सारी उपेक्षा
बीत जाएगा
एक दिन की बात है
फिर वैसे ही रह जाएंगे हम
और वह सभी साथी
जो घर पर रहते हैं तो
बाहर क्यों नहीं जाते
और बाहर जाने पर घर वालों को लगी रहती है फिक्र
कहीं भूल ना जाए
चोट ना खाएं
देर ना हो जाए
किसी से टकरा न जाएं
जीवन कल तक तो ऐसा नहीं था कितने दिन और है नहीं पता जिएंगे जीते रहे हैं
लेकिन यह एहसास
बूढ़े हो जाने का
आज बहुत सालता है
मन तो चाहता है लोग सम्मान दें लेकिन बुढ़ाना
लोग अगर काम करने को न कहें लोग अर्थ हीन न समझें
पैसे ले खर्च भी कराएं
संपत्ति के पीछे न पड़ जाएं अजीब सी दुविधा है
एक दिन की ही है
शाम तक खत्म हो जाएगी
कल से हम फिर वैसे होंगे
जैसे कल तक थे
हमारी ज़िन्दगी मामूल
पर अा जाएगी।

आर एस माथुर
इंदौर

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