काव्यभाषा : नदिया-किनारे – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

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नदिया-किनारे

चलते चलो तुम
किनारे-किनारे।
बढ़ते चलो तुम
किनारे-किनारे।

नदियों से सीखो,
कैसे है बहना।
बीहड़ दुखों का,
कैसे है सहना।

बलखाती नदियों के-
समझो इशारे।
चलते चलो तुम,
किनारे-किनारे।

मकसद है इसका-
सागर में मिलना।
थकन चाहे कितनी,
सीखा न रुकना।

निरंतर ही बहते हैं,
नदियों के धारे ।
चलते चलो तुम,
किनारे-किनारे।

कोई मनचला इसमें,
कंकर उछाले।
कोई धोए मन के,
कलुषित से जाले।

अपनी छटा से,
प्रकृति निखारे ।
चलते चलो तुम,
किनारे-किनारे।

मस्ती में बहने दो,
नदियों का पानी।
रोको न इसकी,
कभी तुम रवानी।

गहराई में इसकी,
नभ के सितारे।
चलते चलो तुम,
किनारे-किनारे।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

1 COMMENT

  1. नदी के माध्यम से आध्यात्मिक चिंतन की ओर उन्मुख करती हुई बहुत ही सुन्दर एवं प्रशंसनीय काव्याभिव्यक्ति ।
    यथा—-
    गहराई में इसकी
    नभ के सितारे ।
    ।चलते चलो तुम,
    किनारे – किनारे ।

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