काव्यभाषा : तुम बहुत कुछ हो – मंजु लता प्रयागराज उत्तर प्रदेश

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तुम बहुत कुछ हो

हाथों में मेंहदी
पांव में महावर
सोलह श्रृंगार किये
सात फेरों के बाद
मुझे ले आये अपने घर
उड़ी-उड़ी सी,घबराई सी
पीछे-पीछे चली गई
डर था तुम निरंकुश तो नहीं
टूटा भ्रम मेरा , पाकर तुम्हें
स्त्री मन को समझने वाला
फूली नहीं समायी मैं
जीवन में साथ दिया तुमने
सुख-दुख में बराबर की
हिस्सेदारी रही तुम्हारी
फिर भी मामले कुछ ऐसे थे
जहां तुम मेरी मदद नहीं कर सकते थे
बीज डाला गर्भ में तुमने
ढोया नौ महीने मैंने,सोचो
सोचो जरा अतिरिक्त भार
ढोने ‌में मुझे कितनी तकलीफ़ हुई
तुम नहीं जान पाये,ये कष्ट सहना
हर रात शिशु पालने में नींद गंवाई
गीले बिस्तर पर करवट बदल बदल सोती रही, तुम ने सहा क्या? नहीं न?सह भी नहीं सकते
बच्चे जब बड़े होते संस्कारहीन निकलते,तब भी
मां बदनाम होती,क्या तुम मेरी
बदनामी अपने सर ले सके।
नहीं न? तुम तो बच निकले
कितनी बातें बताऊं
चलो जितना भी तुमने किया
बहुत किया,सम्मान दिया,प्यार दिया ।सब कुछ दिया।
फिर भी कर्त्तव्य में तुम कमतर
ही रहोगे।जानते हो क्यों?
हम औरतें तो पुरूषों वाले काम
बखूबी कर लेते हैं
घर बाहर दोनों दक्षतापूर्ण निबाहते हैं,जो तुम नहीं कर सकते
क्योंकि तुम्हारे मन में डाल दिया
गया है कि ये सब काम स्त्रियों का
है।चलो कोई बात नहीं,सब चलता
हैं।हंस कर,रो कर,गा कर।
कहे तो जाते हैं —–बड़े किस्मत
वाले हैं हम।
गृहस्थी के दो पहियों ‌में मजबूत
पहिया तुम बने रहे, मैं नहीं।।

मंजु लता
प्रयागराज
उत्तर प्रदेश

1 COMMENT

  1. अपनी रचनाओं को पत्रिका में स्थान देने के लिए सम्पादक
    देवेन्द्र सोनी जी को तहे दिल से शुक्रिया अदा करती हूं।अब तक मैंने पाया कि रचनाओं के प्रकाशित करने में हमेशा निशपक्षता दिखलाई है।नि:शुल्क ही नये रचनाकारों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।अचछी सामग्रियों को पढ़ने का हमेंं मौका मिलता है। देवेन्द्र सोनी जी का बहुत-बहुत
    आभार।

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