ग़ज़ल : आदमी – डॉ .प्रतिभा कुमारी पराशर ,हाजीपुर बिहार

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ग़ज़ल

आदमी

आदमी से आदमी मुँह मोड़ता है।
मतलबी इंसान रिश्ता तोड़ता है।।

क्या जमाना आ गया बेखबर जग से
आज भाई-बंधु को भी छोड़ता है।

रो रहे हैं माँ -पिताजी याद करके
कुल कलंकित वंश जो कुल बोरता है।

बेटियों की इज्जतों से खेलता है
मां- बहन- सम प्यार दो क्यों घूरता है।

कृष्ण जैसा मित्र प्रतिभा क्या मिलेगा
मित्रता का मान रख घर जोड़ता है ।

डॉ .प्रतिभा कुमारी पराशर
हाजीपुर बिहार

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