काव्य भाषा : जीवन के दोराहे में -नीलम द्विवेदी रायपुर, छत्तीसगढ़

Email

जीवन के दोराहे में

निर्णय लेने की बेला में, हृदय पथिक का भर आया ,
इस जीवन के दोराहे में, आज खड़े खुद को पाया,

है एक तरफ दुर्गम रस्ता, है एक तरफ शीतल छाया,
एक तरफ बाहें फैलाये,राह देखती खड़ी प्रियतमा,

एक तरफ आलिंगन करने, मुझको मेरा फर्ज बुलाया,
मेहंदी लगे हाथ की खुश्बू, हर पल पास बुलाते हैं,

काले घने केश उड़ उड़ कर,बादल से बन जाते हैं,
मेरे उर में व्याकुलता के, कुछ ऐसे भाव जगाते हैं,

प्रिय की विचलित ह्रदय गति, मेरे अहसास भीगाते हैं,
लगता है अब चुन लूँ मैं, वो राह प्रिये जो तुम तक पहुँचे,

जी लूँ जीवन के सभी रंग, हँसकर मुधुमास बुलाते हैं,
देखो फिर से पैरों से लिपटी, मिट्टी ने कुछ याद दिलाया,

कारगिल में बीता हर पल, आज मुझे फिर छू कर गुजरा,
हिम शिखरों की सर्द हवाएँ ,जो फ़ौलादी सीना झेल चुके,

पाने को फिर सानिध्य मेरा, दुर्गम राहों को आतुर पाया,
माना की इक काली छाया को, घात लगाए हर पल पाया,

लेकिन आज मेरे कदमों को, डर कोई रोक नहीं पाया,
आज पुनः आलिंगन करने, मुझको मेरा फर्ज बुलाया।
मैं पथिक हृदय मेरा फ़ौलादी, देश की खातिर लड़ने आया।।

नीलम द्विवेदी
रायपुर, छत्तीसगढ़